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अंडमान के लिए बनी योजना पर विवाद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
थाईलैंड के पर्यटन स्थल फुकेत की तर्ज़ पर भारत के अंडमान द्वीप में पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना का पर्यावरणविदों ने विरोध किया है. पर्यावरणविदों का कहना है कि अगर थाईलैंड की तरह अंडमान थाईलैंड और भारत ने पिछले हफ़्ते ही इस सिलसिले में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. प्रशासन का कहना है कि थाईलैंड के साथ हुए समझौते से इन द्वीपों की आमदनी बढ़ेगी. पिछले साल दिसंबर में आए सूनामी तूफ़ान के बाद से अंडमान में आने वाले पर्यटकों की संख्या कम हुई है. अंडमान निकोबार में सालाना दस हज़ार सैलानी आते थे लेकिन अब इसमें काफ़ी गिरावट आई है. निर्देश का उल्लंघन पर्यावरणविदों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक़ प्रशासन का दायित्व है कि वो द्वीप के पर्यावरण और यहाँ की जनजातियों की रक्षा करे.
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को लिखे एक पत्र में इन लोगों ने कहा है कि अंडमान निकोबार प्रशासन इन आदेशों का उल्लंघन कर रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक़ फुकेत में कोरल यानि मूंगा प्रजातियाँ हो रही हैं उनका कहना है कि वहाँ बच्चों का शोषण और वेश्यावृत्ति का धंधा बढ़ा है जिससे एड्स भी फैल रहा है. विशेषज्ञों का ये भी कहना है कि जारवा जनजाति के लोगों की रक्षा के लिए प्रशासन ने उचित क़दम नहीं उठाए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जारवा जनजाति के जंगलों से गुज़रने वाला मार्ग बंद कर दिया जाए क्योंकि इससे इन लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है. |
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