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आँगन के पार: पहली कड़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट और बीबीसी हिंदी की साझा प्रस्तुति है आँगन के पार. एक कार्यक्रम जिसमें ख़ास तौर पर ग्रामीण महिलाओं के सरोकारों, उनके स्वास्थ्य, उनके सशक्तिकरण और एचआईवी-एड्स पर चर्चा होती है. इस कार्यक्रम को गढ़ने की ज़िम्मेदारी उठाई है बारह वैसी महिलाओ ने जो पेशेवर पत्रकार तो नहीं हैं लेकिन आपके आसपास जो ज़िंदगी बसर होती है उसके ताने-बाने को वे बखूबी समझती हैं. कार्यक्रम के संपादन और प्रस्तुतिकरण रूपा झा कर रही हैं. हर शुक्रवार को बीबीसी हिंदी और आकाशवाणी के 22 चैनलो पर प्रसारित होने वाले इस कार्यक्रम की पहली कड़ी मे चर्चा हो रही है एचआईवी-एड्स की. किस तरह महिलाएँ इस ख़तरे से जूझ रही हैं. भारत सरकार के आंकड़ो के अनुसार भारत मे इस समय 52 लाख लोग एचआईवी के वायरस के साथ जी रहे है जिनमें चालीस प्रतिशत महिलाएँ है. कार्यक्रम मे हिस्सा लिया है राष्ट्रीय एड्स कंट्रोल संस्थान नैको की महानिदेशक सुजाता राव ने और एचआईवी के वायरस के साथ पिछले 12 सालो से निजी जीवन मे ही नही बल्कि सामाजिक जीवन मे भी डट कर मुक़ाबला कर रही शांति ने. इसके अलावा बिहार, झारखंड और उत्तरप्रदेश से इस मसले पर आम लोगों की राय के साथ-साथ शामिल है ग्रामीण औरतो की वो आवाज़ें जहाँ वे अपने पतियो के साथ सुरक्षित यौन संबंध के मुद्दे पर उनके साथ हो रही हिंसा पर खुल कर चर्चा कर रही हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें एचआईवी संक्रमित जोड़ियों की शादी03 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस ख़तना से एड्स पर अंकुश13 अगस्त, 2006 | पहला पन्ना 'एड्स के प्रसार से अर्थव्यवस्था पर असर'21 जुलाई, 2006 | कारोबार एचआईवी के टीके के लिए 30 करोड़ डॉलर19 जुलाई, 2006 | विज्ञान एड्स पीड़ित माँ-बाप के कारण आत्महत्या03 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस भारत में एड्स के ख़िलाफ़ संयुक्त मुहिम23 जून, 2006 | भारत और पड़ोस संयुक्त राष्ट्र एड्स घोषणापत्र पर सवाल 02 जून, 2006 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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