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गुजरात में 'बिना चूक गाएँ' वंदे मातरम् | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात सरकार ने सात सितंबर को राज्य के स्कूलों में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् गाने के संबंध में निर्देश जारी कर दिए हैं. आदेश में कहा गया है कि ‘राष्ट्रगीत सामूहिक रूप से और बिना किसी चूक के सभी सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में गाया जाना चाहिए.’ हालांकि इस निर्देश में धार्मिक स्कूलों और निजी संस्थानों का ज़िक्र नहीं है. दरअसल भारतीय जनता पार्टी ने अपने शासनवाले सभी पाँच राज्यों के स्कूलों को सात सितंबर को राष्ट्रगीत गाए जाने के लिए कहा है. मुस्लिम संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है और कुछ मुस्लिम संगठनों ने अपने बच्चों को इस दिन स्कूल न भेजने का फ़ैसला किया है. प्रेक्षकों का कहना है कि गुजरात सरकार ने केवल सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में वंदे मातरम् गाने के निर्देश दिए हैं और मदरसों और निजी संस्थानों में ऐसा करने को न कह कर विवाद से बचने की कोशिश की है. इधर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इस मामले पर कड़ा रुख़ अपनाते हुए कहा है कि राष्ट्रगीत जैसे राष्ट्रीय प्रतीक को वैकल्पिक नहीं किया जा सकता है. उनका कहना था कि इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता था. क्रांतिकारी गीत ग़ौरतलब है कि राष्ट्रगीत को बंगाली कवि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1876 में अपनी किताब आनंदमठ में संस्कृत में लिखा था. इस गीत को पहली बार 1905 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में गाया गया था. थोड़े ही समय में यह गीत काफी लोकप्रिय हो गया और अंग्रेज़ शासन के ख़िलाफ़ क्रांति का प्रतीक बन गया.
पहले इस गीत को ही भारतीय राष्ट्र गान बनाने की कोशिश की गई थी लेकिन मुसलमानों का कड़ा विरोध देखते हुए रवींद्रनाथ ठाकुर के जन-गण-मन को राष्ट्रगान का दर्जा दिया गया. कड़े विरोध के बावजूद स्वतंत्र भारत में वंदे मातरम् गीत का महत्व लगातार बना रहा. इसे आज भी संसद सत्र शुरू होने से पहले और ख़त्म होने के बाद गाया जाता है. वर्ष 2005 में भारत सरकार ने घोषणा की थी कि कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में गाए गए इस गीत के सौ वर्ष पूरे होने के मौक़े पर साल भर समारोह बनाए जाएंगे. इसी संदर्भ में देश के सारे स्कूलों जिनमें इस्लामी मदरसे भी शामिल हैं, उनको आदेश दिया गया कि 7 सितंबर के दिन इस गीत को गाना अनिवार्य है. इस घोषणा का मुस्लिम संगठनों ने ज़ोरदार विरोध किया जिसके बाद केंद्र सरकार ने इसे अनिवार्य की जगह ऐच्छिक क़रार दे दिया. इस बदलाव को भाजपा ने अस्वीकार करते हुए कहा है कि इससे राष्ट्रप्रेम की भावना को ठेस पहुँचती है. भाजपा के इस निर्णय का कुछ लोग यह कह कर भी विरोध कर रहे हैं कि 7 सितंबर का इस गीत के ऐतिहासिक महत्व से कुछ लेना देना नहीं है. |
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