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शनिवार, 19 अगस्त, 2006 को 13:44 GMT तक के समाचार
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सूचना के अधिकार में अभी संशोधन नहीं

अभियान
संशोधन में सूचना के अधिकार से फाइल नोटिंग्स को हटाने का प्रस्ताव था
सूचना के अधिकार संबंधी क़ानून में प्रस्तावित संशोधनों के ख़िलाफ़ जारी आंदोलनों के दबाव में सरकार ने इन संशोधनों को संसद के चालू सत्र में पेश नहीं करने का फ़ैसला किया है.

इस फ़ैसले के बाद सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने पिछले 11 दिनों से जारी उपवास तोड़ दिया है.

प्रधानमंत्री का संदेश लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री पृथ्वीराज चौहान अन्ना हज़ारे से मिले और उन्हें इस संबंध में आश्वस्त कर उपवास तोड़ने के लिए मनाया. हज़ारे ने इस बारे में लिखित आश्वासन की भी मांग की थी.

सूचना के अधिकार संबंधी क़ानून में प्रस्तावित संशोधनों के खिलाफ़ पिछले कुछ दिनों से देश के कई हिस्सों में लगातार अभियान चल रहा था.

शनिवार सुबह आंदोलनरत कार्यकर्ताओं की यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाक़ात का असर मात्र कुछ घंटों में दिखा जब संसदीय कार्य राज्य मंत्री सुरेश पचौरी ने बताया कि सरकार संसद के इस सत्र में क़ानून में प्रस्तावित संशोधन नहीं ला रही है.

पचौरी ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ विचार-विमर्श के बाद यह फ़ैसला किया गया है.

हालाँकि उन्होंने यह साफ़ नहीं किया कि फाइल नोटिंग्स यानी दस्तावेज़ों पर नौकरशाहों की टिप्पणियों से जुड़े ये प्रस्तावित संशोधन पूरी तरह हटा लिए जाएँगे या नहीं.

दूसरी ओर संशोधनों का विरोध कर रहे सूचना अधिकार से जुड़े आंदोलनकारी इस घोषणा से ख़ुश थे.

स्वागत

आंदोलनरत अरविंद केजरीवाल ने कहा, "सरकार ने आश्वासन दिया है कि अब जो भी संशोधन लाया जाएगा उसके लिए लोगों से बातचीत की जाएगी. ये अपने आप में अच्छी बात है कि बातचीत होगी, विचार विमर्श होगा तभी बदलाव किए जाएँगे. ये तो नहीं कह सकते कि किसी भी क़ानून में बदलाव नहीं हो सकता लेकिन इसके लिए संबंद्ध लोगों से बातचीत करने की मंशा सही क़दम है.

सरकार के आश्वासन से केजरीवाल भले ही आशावान हों लेकिन समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने सरकार से लिखित आश्वासन की मांग की है और उन्हें मनाने प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री पृथ्वी राज चौहान पहुँचे.

सूचना के अधिकार को लेकर चल रहे आंदोलन के दबाव में प्रस्तावित संशोधनों को संसद के इस सत्र में पेश नहीं करने के फ़ैसले से विवाद पर फ़िलहाल विराम लग गया है.

लेकिन एक बात साफ नहीं हो पा रही है कि 11 महीनों में ही ऐसा क्या हो गया जिसके कारण सरकार को ऐसा विवादास्पद संशोधन लाने की आवश्यकता पड़ी है.

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