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क्या राजा ज्ञानेंद्र ने बहुत देर कर दी? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र पर लोकतंत्र बहाल करने और अपने राजनीतिक विरोधियों की प्रमुख माँगें मानने का दबाव इतना ज़्यादा हो गया था कि उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती थी. विरोध प्रदर्शन इतना ज़्यादा भावनात्मक हो गए कि सुरक्षा बलों के लिए प्रदर्शनकारियों को रोक पाना सुरक्षा बलों के लिए आसान नहीं रह गया. नेपाल से बाहर भारत और अमरीका जैसे मित्र रहे देश भी लोकतंत्र बहाल नहीं किए जाने को लेकर धैर्य खोने लगे. अभी पिछले सप्ताह ही अमरीकी विदेश विभाग ने खुलेआम कहा कि नरेश ज्ञानेंद्र के सीधे शासन का फ़ॉर्मूला बुरी तरह पिट गया है. एक विशेष दूत को काठमांडू भेजने का भारत सरकार के क़दम को नेपाल नरेश पर समझौते का दबाव डालने के अंतिम प्रयास के रूप में देखा जा सकता है. बुरे फँसे राजा ने जो रियायतें दी हैं वो साल भर पहले जनता की आकांक्षाओं को संतुष्ट करने के लिए तो पर्याप्त थीं लेकिन अब मुख्य सवाल यह है कि है कि क्या मौजूदा माहौल में ये क़दम पर्याप्त साबित होंगे. कई विश्लेषकों का मानना है कि बीते दिनों में बातचीत से इनकार करते रहना अंतत: नेपाल नरेश के लिए भारी साबित हो सकता है. विरोध प्रदर्शनों के तेज़ होने से उनके विकल्प सीमित हो गए थे. राजा ज्ञानेंद्र ने पहले लोकतंत्र को यह कहते हुए स्थगित किया कि राजनीतिज्ञ माओवादियों को दबाने में नाकाम रहे हैं, लेकिन विद्रोहियों से बातचीत से इनकार करते हुए उन्होंने स्वयं स्थिति को और बिगाड़ा ही. पिछले साल जब माओवादियों और प्रमुख राजनीतिक दलों ने हाथ मिला लिए, तभी यह तय हो गया था कि नरेश ने खुद को बुरी तरह अलग-थलग कर लिया है. उसके बाद से परिस्थितियाँ इतनी बदल चुकी हैं कि अब नेपाल नरेश न सिर्फ़ लोकतंत्र समर्थकों से लड़ रहे हैं, बल्कि नेपाल में राजशाही को बचाने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं. |
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