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भारतीय संसद में ईरान मुद्दे पर चर्चा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ईरान के मुद्दे पर भारतीय संसद में शुक्रवार को चर्चा होने वाली थी जो सोमवार को शुरू हो पाई. चर्चा की शुरूआत राज्य सभा में विपक्ष की उप नेता सुषमा स्वराज ने की. हर तरफ़ से, और हर नज़रिए से ग़ैर काँग्रेसी पार्टियों ने सरकार से मुश्किल सवाल किए. सुषमा स्वराज के अनुसार, भारत ने ईरान के ख़िलाफ़ वोट देकर दोहरे मापदंड दिखाए हैं. उनका कहना था कि ईरान को परमाणु क्षमता प्रदान करने में पाकिस्तान की भूमिका की उपेक्षा क्यों हो रही है. स्वराज ने कहा कि अगर ईरान के ख़िलाफ़ वोट डाला जा रहा है तो उसका भी ज़िक्र किया जाना चाहिए और निंदा भी. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी का कहना था कि भारत ने हमेशा नए प्रकार के सुझाव देकर दुनिया में अपने लिए एक नया स्थान बनाया है लेकिन इस विषय में, भारत ने अपने ही तय मापदंडों के खिलाफ़ काम किया है. येचूरी ने कहा कि आज जो ईरान के साथ हो रहा है वह बिल्कुल वैसा ही है जो इराक़ के साथ हुआ था और दुनिया को उसी दिशा में ढकेला जा रहा है. दूसरी तरफ़ कैबिनेट मंत्री कपिल सिबल ने प्रधानमंत्री के जागरूक राष्ट्रीय हित को बिल्कुल उचित बताया. उन्होंने कहा कि स्थिति चूँकि बहुत स्पष्ट नही है इसलिए सरकार समय आने पर फ़ैसला लेगी और सबकुछ राष्ट्रीय हित में होगा. वोट किसे दिया जाएगा यह परिस्थितियों के अध्ययन के बाद तय होगा. ग़ैर कांग्रेसी पार्टियों का आरोप मुख्य रूप से ये है कि भारत ने अमरीकी दबाव में आकर फ़ैसले लिए हैं. बहस का स्तर काफ़ी ऊँचा था, और सभी पक्षों ने एक दूसरे की बात सुनी. अमरीकी उपनिवेश को लेकर यह जज़्बा और मुखर होकर शायद इसलिए आया क्योंकि राष्ट्रपति बुश की दक्षिण एशिया यात्रा को लेकर भी इस समय चर्चा गरम है. |
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