| भारत-अमरीकी परमाणु बातचीत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के एक कनिष्ठ मंत्री निकोलस बर्न्स ने परमाणु सहयोग बढ़ाने के मुद्दे पर भारत के विदेश सचिव श्याम सरन से शुक्रवार को दिल्ली में मुलाक़ात की है. कई घंटों तक चली बातचीत के बाद दोनों ने उम्मीद जताई कि अमरीकी राष्ट्रपति के आगामी भारत दौरे से पहले सभी मुद्दों पर सहमति हो जाएगी. उम्मीद है कि जॉर्ज बुश अगले साल की शुरूआत में भारत आएँगे. बैठक के बाद भारत के विदेश सचिव ने कहा, "हमने अमरीका से कुछ मुद्दों पर स्पष्टीकरण माँगा और उन्होंने भी हमसे स्पष्टीकरण माँगा." कांग्रेस की मंज़ूरी ग़ौरतलब है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जब जुलाई में अमरीका गए थे तब दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग के समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे. परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण समझौता है और बदले में उसने अपने परमाणु क्षेत्र में असैनिक और सैनिक कार्यक्रमों को अलग करने का वादा किया है. भारत के मामले में बुश प्रशासन की इस रियायत से अमरीकी संसद कांग्रेस में चिंता नज़र आई है और रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही सांसदों ने ये चिंता ज़ाहिर की है. लेकिन निकोलस बर्न्स ने बैठक के बाद भरोसा जताते हुए कहा, "अमरीका इस समझौते के प्रति वचनबद्ध है और हमें लगता है कि ये दोनों के लिए फ़ायदेमंद है." भारत के साथ समझौते को मंज़ूरी देने के लिए बुश प्रशासन को अमरीकी क़ानून में बदलाव लाना होगा. बुश प्रशासन ने भरोसा जताया है कि भारत के साथ समझौते को कांग्रेस की मंज़ूरी मिल जाएगी. ग़ौरतलब है कि उस समझौते को लागू होने के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी मिलना ज़रूरी है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||