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मलफ़र्ड को वापस भेजने की माँग
संसद
संसद से बाहर भी वामपंथी दल डेविड मलफ़र्ड को वापस भेजने की माँग कर चुके हैं
भारत में अमरीकी राजदूत डेविड मलफ़र्ड के बयानों का विरोध करते हुए वामपंथी दलों ने उन्हें वापस भेजने की माँग की और संसद के दोनों सदनों से वॉकआउट किया.

वामपंथी दलों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम के मसले पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी (आईएईए) में वोट से पहले भारत को लेकर राजदूत मलफ़र्ड के बयान का विरोध किया.

उन्हें इस बात पर भी सख़्त आपत्ति थी कि डेविड मलफ़र्ड ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य को सीधे पत्र किस तरह लिखा.

अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की भारत यात्रा के एक हफ़्ते पहले सरकार को समर्थन दे रही वामपंथी पार्टियों के इस रुख़ को सरकार के लिए असुविधाजनक माना जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि ईरान के मसले पर डेविड मलफ़र्ड ने गत 25 जनवरी को कह दिया था कि यदि भारत आईएईए में अमरीका का साथ नहीं देता है तो परमाणु संधि पर असर पड़ सकता है.

इसके अलावा उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में वामपंथी दलों के रुख़ पर भी टिप्पणी की थी.

शून्यकाल में सीपीएम के नेता नीलोत्पल बसु ने राज्यसभा में ये मामले उठाते हुए अमरीकी राजदूत की कार्यशैली पर आपत्ति जताते हुए इसे 'बेहद शर्मनाक' बताया.

उन्होंने कहा कि यदि डेविड मलफ़र्ड भारत के किसी राजनीतिक दल में शामिल होने के बाद वामपंथी दलों की नीतियों की निंदा करते हैं तो वे इसका स्वागत करेंगे, लेकिन एक राजदूत को ऐसा नहीं करना चाहिए.

वामपंथी दलों के नेताओं ने शर्म-शर्म के नारे के बीच कहा कि मुख्यमंत्री को सीधे पत्र लिखकर राजदूत प्रोटोकॉल का पालन नहीं कर रहे हैं और उन्हें वापस भेज दिया जाना चाहिए.

वामपंथी दलों के इस विरोध का जवाब देते हुए राज्यमंत्री सुरेश पचौरी ने कहा कि वे वामपंथी दलों की भावना से प्रधानमंत्री को अवगत करवा देंगे.

सरकार की ओर से कोई आश्वासन न मिलने पर वामपंथी दलों ने राज्यसभा से वॉकआउट किया.

इसी तरह लोकसभा में यह मुद्दा बासुदेब आचार्य ने यह मामला उठाया.

और राज्यसभा की तरह ही लोकसभा में संसदीय कार्यमंत्री प्रियरंजन दासमुंशी के बयान से असंतुष्ट वामपंथी दलों ने वॉकआउट किया.

वामपंथी दलों ने इस मामले में प्रधानमंत्री से बयान देने की माँग की है.

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