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गुरुवार, 26 जनवरी, 2006 को 04:54 GMT तक के समाचार
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क्या कहा अमरीकी राजदूत ने?
मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश
अमरीका और भारत के बीच असैनिक परमाणु कार्यक्रमों पर समझौता पिछले साल जुलाई में हुआ था
भारत में अमरीकी राजदूत डेविड सी मलफ़र्ड के कार्यालय ने एक विज्ञप्ति जारी करके कहा है कि समाचार एजेंसी पीटीआई को दिया गए उनके साक्षात्कार को सही संदर्भों में नहीं देखा गया.

इसमें कहा गया है कि मलफ़र्ड ने कहा था कि भारत अपने हितों के ध्यान में रखकर ही ईरान के मसले पर वोट करेगा.

इस विज्ञप्ति के साथ पीटीआई को दिए गए साक्षात्कार के अंश भी भेजे गए हैं.

और यही अंश दिलचस्प है क्योंकि इसमें अमरीकी राजदूत साफ़ कह रहे हैं कि यह अमरीकी अवलोकन है कि अगर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की बैठक में भारत ने ईरान का साथ दिया तो यह भारत और अमरीका के बीच हुए असैनिक परमाणु समझौते के लिए विनाशकारी साबित होगा. हालांकि वे इसे अमरीका का निष्पक्ष अवलोकन कह रहे हैं.

साक्षात्कार के उस अंश का अनुवाद जिसे अमरीकी राजदूत के कार्यालय ने जारी किया है -

सवाल - हम ईरान की बात करें. ये मसला दो फ़रवरी को आने वाला है और मामला सुरक्षा परिषद में भेजे जाने को लेकर भारत का रुख़ अभी तक किसी के पक्ष में साफ़ नहीं दिख रहा है. वह कह रहा है कि ये आईएईए के दायरे में भी हो. इस पर अमरीका का मत क्या है?

राजदूत मलफ़र्ड – भारत क्या कह रहा है, एक बार फिर से बताइए?

सवाल – भारत इसे आईएईए के दायरे में चाहता है. पिछली बार भी भारत ऐसा चाहता था. भारत इस मसले को सुरक्षा परिषद में नहीं जाने देना चाहता.

राजदूत मलफ़र्ड – सितंबर में जब यह प्रस्ताव आया था तो ईरान को नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया गया था हालांकि यह मसला तत्काल सुरक्षा परिषद में नहीं भेजा गया क्योंकि अमरीका का मत था कि ईरान को कूटनीतिक का रास्ता दिया जाना चाहिए. उस समय भारत ने जिस तरह वोट दिया उससे साफ़ झलकता था कि भारत ने देशहित में मतदान किया है. आपको पता है कि भारत ने अमरीका को ख़ुश करने के लिए वोट नहीं दिया था. भारत नहीं चाहता कि ईरान के पास परमाणु हथियार हो. जैसा मुझे बताया गया, यहाँ आसपड़ोस में बहुत से देशों के पास पर्याप्त परमाणु हथियार हैं और वे नहीं चाहते कि और किसी के पास परमाणु हथियार हों और इसलिए उन्होंने इसका विरोध किया. और इसलिए अब ये मसला सुरक्षा परिषद में भेजने की बात हो रही है.

भारत को एक बार फिर तय करना होगा कि उसका राष्ट्रीयहित किसमें है और मैं समझता हूँ कि यह फ़ैसला भारत के हाथों में छोड़ना बेहतर होगा.

सवाल – क्या अमरीकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा से पहले भारत सरकार से इस कोई चर्चा होनी है?

राजदूत मलफ़र्ड – मुझे नहीं लगता, मतलब ज़रुर बात करेंगे, हमने उन्हें दो बातें स्पष्ट कर दी हैं. एक तो यह कि ईरान के मसले पर भारत का समर्थन ज़रुर चाहेगा क्योंकि दुनिया में अब भारत की स्थिति महत्वपूर्ण है. यदि भारत चाहता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों तो उसे वोट देकर इसका विरोध करना होगा. दूसरा, यह अमरीका का एक प्रेक्षक की तरह राय है, यानी एक निष्पक्ष मत है कि यदि भारत ऐसा नहीं करता है तो, हमारी राय में, इसका असर, अमरीकी कांग्रेस के सदस्यों पर, ‘असैनिक परमाणु संधि के संदर्भ में विनाशकारी हो सकते हैं’.

सवाल – विनाशकारी?

राजदूत मेलफ़र्ड – मैं समझता हूँ कि अमरीकी संसद भारत के साथ असैनिक परमाणु समझौते पर विचार करना बंद कर सकती है. ऐसा इसलिए नहीं कि प्रशासन ऐसा चाहता है बल्कि इसलिए कि संसद ऐसा चाहती है. पिछले साल सितंबर में संसद को भारत के रुख़ पर संदेह था लेकिन जब भारत ने ईरान के विरोध में वोट दिया तो संसद ने भारत को भरपूर समर्थन दिया. ऐसा सिर्फ़ अमरीकी कांग्रेस ही नहीं बल्कि परमाणु सामग्री की आपूर्ति करने वाले समूह का भी मत हो सकता है. वे पूछ सकते हैं कि जिस भारत के लिए हम अपनी नीतियों में परिवर्तन करने जा रहे हैं वही भारत तो इस मसले पर सामने आने को भी तैयार नहीं है. तो इसका असर उन पर भी हो सकता है.

सवाल – तो क्या भारत को इसे भी ध्यान में रखना होगा?

राजदूत मलफ़र्ड - यह सिर्फ़ हमारा अवलोकन है. लेकिन भारत को इस तरह निर्णय लेना होगा जैसे कि ये आख़िरी निर्णय हैं और उन्हें अपने देश के हितों का भी ध्यान रखना होगा.

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