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'भारत-ईरान रिश्तों पर असर पड़ेगा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम की शिकायत सुरक्षा परिषद से करने के प्रस्ताव का समर्थन करने का भारत-ईरान रिश्तों पर थोड़ा असर अवश्य पड़ेगा. इससे थोड़ी कडुवाहट पैदा होगी. लेकिन दोनों देशों के बीच रिश्तों की बुनियाद ऐतिहासिक हैं, इसलिए वह बने रहेंगे. इस समय ईरान अलग-थलग पड़ गया है और उसे हमसफ़र की तलाश है. अगर वह भारत का भी हाथ छोड़ देगा तो उसके लिए ज़्यादा मुश्किल होगी. जहाँ तक भारत और ईरान के बीच गैस पाइप लाइन का सवाल है तो इसमें ईरान और भारत दोनों का ही फ़ायदा है. इसलिए मुझे लगता है कि आर्थिक रिश्ते कायम रहेंगे. यह अवश्य है कि इस मतदान से कूटनयिक रिश्तों में ज़रूर हलचल पैदा होगी. लेकिन उनका समाधान हो जाएगा. यह ज़रूर है कि भारत के पास अनुपस्थित रहने का विकल्प था. लेकिन एक तो अमरीका का दबाव था. दूसरे रूस के प्रस्ताव पर सहमति नहीं बन पा रही थी. इसलिए भारत के पास कोई और चारा नहीं था. यह कहना ठीक नहीं है कि भारत ने अमरीका से हाथ मिला लिया है क्योंकि लगभग सभी देश इस फ़ैसले से सहमत थे. मुझे लगता है कि ईरान ने शायद यह सोचा नहीं था कि रूस, चीन और भारत जैसे दोस्त देश भी उसका साथ छोड़ देंगे. आईएईए के निदेशक मंडल के 35 सदस्य देशों में से 27 ने इस फ़ैसले के पक्ष में मतदान किया. केवल तीन देशों ने इसके विरोध में वोट दिया और पाँच देशों ने इस मामले पर मतदान में भाग नहीं लेने का फ़ैसला किया है. (रेणु अगाल से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें भारत ने ईरान के ख़िलाफ़ मतदान किया04 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु कार्यक्रम की शिकायत का निर्णय04 फ़रवरी, 2006 | पहला पन्ना 'मलफ़ोर्ड के बयान में कांग्रेस की भावना'26 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस मलफ़र्ड को लेकर राजनीति गरमाई30 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस ईरान पर भारतीय रूख़ पर अमरीकी नज़र25 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस क्या कहा अमरीकी राजदूत ने?26 जनवरी, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु क्षेत्र में पूरे सहयोग का भरोसा18 जुलाई, 2005 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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