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हाथियों के लिए बनाया जा रहा है सुरक्षित रास्ता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हाथियों की बढ़ती समस्या के बाद भारत में अब कोशिश की जा रही है कि दो जंगलों के बीच एक गलियारा विकसित कर उसका संरक्षण किया जा सके. विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे हाथियों को जंगलों में ही रोकना संभव होगा और उनके आबादी वाले इलाक़ों में घुसने की घटनाओं में कमी आएगी. भारत में ऐसे 88 गलियारों की पहचान की गई है और उन पर कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ सरकार के साथ मिलकर काम कर रही हैं. समस्या और गलियारे लगातार बढ़ती जनसंख्या और जंगल पर बढ़ते दबाव ने पिछले कुछ दशकों में हाथियों की समस्या को बढ़ाया है.
हाथी अक्सर आबादी वाले इलाक़े में घुसने लगे और इससे जानमाल का बड़ा नुक़सान भी हुआ है. हाथियों के जानकार संदीप कुमार तिवारी कहते हैं, "इसका कारण ढूँढ़ने के लिए पहले ये सोचना होगा कि हाथी हमारे इलाक़ों में घुस आए हैं या फिर हम ही उनके इलाक़ों में घुस गए हैं." वे कहते हैं कि इसके लिए देखना होगा कि हाथी दो जंगलों के बीच जिन इलाक़ों का उपयोग ऐतिहासिक रुप से करते रहे हैं वहाँ निर्माण कार्य आदि कितना हुआ है. दरअसल यही वो इलाक़े हैं जिन्हें विशेषज्ञ कॉरिडोर (या गलियारा) कहते हैं और इनके बंद हो जाने के कारण हाथियों को लेकर मुश्लिलें बढ़ी हैं. हाथियों के गलियारों पर प्रकाशित एक किताब के सहलेखक संदीप कुमार तिवारी कहते हैं कि यदि इन गलियारों को किसी तरह फिर से विकसित किया जा सके तो यह समस्या एक तरह से हल हो सकती है. गलियारों का विकास वे बताते हैं कि देश में कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने मिलकर देश भर में इन गलियारों का अध्ययन किया है और इसके बाद कोई 88 गलियारों की पहचान की गई जिनका संरक्षण किए जाने की ज़रुरत है.
देश के विभिन्न राज्यों में स्थित इन गलियारों को अब हाथियों के आवागमन के लिए संरक्षित करने की कोशिश की जा रही है. वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया से जुड़े संदीप बताते हैं, "कुछ जगह तो स्वयंसेवी संगठनों ने गलियारे की ज़मीन ख़रीदकर इसे विकसित कर राज्य सरकार के हवाले करने की शुरुआत की है." इस योजना से वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया के अलावा इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफ़ेयर, यूएस फ़िश एंड वेलफेयर सर्विस और एशियन नेचर कंज़र्वेशन फ़ाउंडेशन जुड़े हैं. इसके अलावा गलियारों के संरक्षणों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की भी सहायता ली जा रही है. संदीप कहते हैं, "हमारी पहली कोशिश है कि इन गलियारों को राजकीय गलियारा घोषित कर दिया जाए ताक़ि लोगों को जानकारी भी हो कि इन इलाक़ों में विकास के कार्य नहीं किए जा सकते." वे कहते हैं कि ये कहना सही नहीं होगा कि हाथियों से लोगों को बचाना ज़रुरी है क्योंकि हाथियों को भी बचाना ज़रुरी है. यह प्राकृतिक संतुलन क़ायम करने की बात है. | इससे जुड़ी ख़बरें हाथियों के संरक्षण पर एशियाई सम्मेलन28 जनवरी, 2006 | पहला पन्ना हाथियों से परेशान है छत्तीसगढ़20 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस जंगली हाथियों पर नियंत्रण की कोशिश02 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस हाथी भगाने के लिए मिर्ची बम08 जून, 2005 | भारत और पड़ोस हाथियों के उत्पात को रोकने के लिए करंट28 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस हाथियों के लिए भारत की अपील16 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस शराबी हाथियों की जानें गईं20 जनवरी, 2004 | भारत और पड़ोस हाथियों को पेंशन | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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