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'अब हमेशा जन्मदिन से घबराउंगा'

परमेश्वरन और चूडामणि
दोनों ने हिम्मत नहीं हारी है
दक्षिण भारत के नागपट्टनम में अपने घर की दूसरी मज़िल से कारिबीरन परमेश्वरन हाथों में एक तस्वीर लिए उतरते हैं. परमेश्वरन बुझे मन लेकिन चेहरे के भावों को संभालते हुए तस्वीर दिखाते हैं.

तस्वीर, बालों में फूल लगाए दो ख़ूबसूरत-सी, मुस्कुराती हुई उनकी बेटियों की हैं.

दोनों बच्चियों ने अपने छोटे भाई के गले में हाथ डाल रखा है. यह 12 साल की रक्षन्या, नौ वर्षीय कारुण्या और पाँच साल के किरुबासन की आख़िरी तस्वीर है जो पिछले वर्ष क्रिसमस से कुछ दिन पहले खींची गई थी.

पेशे से इंजीनियर परमेश्वरन 26 दिसंबर 2004 को चालीस वर्ष के हुए थे.

उस दिन को याद करते हुए वो कहते हैं, "मुझे याद है, कैसे मेरा बेटा उस दिन मुझे जगाने आया था. उसने फुसफुसाकर मेरे कानों में जन्मदिन की बधाई दी थी और मुझे गुदगुदाना शुरु कर दिया था. फिर मेरी बड़ी बेटी मेरे लिए चाय लेकर आई थी और उसने मेरी लंबी उम्र की कामना की थी."

वो अपने आप को संभालते हुए कहते हैं, "अब पूरी ज़िदंगी मैं अपने हर जन्मदिन को याद करते हुए घबराउंगा."

विनाशकारी लहरें

परमेश्वरन के शहर ने सूनामी लहरों का ज़बरदस्त कहर झेला था. तमिलनाडु राज्य के इस शहर के मछुआरे समुदाय को बहुत अधिक नुक़सान उठाना पड़ा था. लगभग छह हज़ार लोग सूनामी लहरों का शिकार हुए जिनमें दो-तिहाई संख्या महिलाओं और बच्चों की थी.

परमेश्वरन और चूडामणि क्लिंटन के साथ

उस अभागे दिन परमेश्वरन और बंगलौर से आए उनके सात रिश्तेदारों ने चर्च जाने से पहले समुद्र तट पर घूमने का फ़ैसला किया था.

उनकी पत्नी चूड़ामणि के इन रिश्तेदारों ने पहले कभी समुद्र नहीं देखा था और वे यह सोच कर बहुत ख़ुश थे कि इस बार क्रिसमस की छुट्टियाँ समुद्र तट के इतने नज़दीक बिताएँगे.

वे सब समुद्र के किनारे खेलने में लगे थे कि विनाशकारी लहरों ने उन्हें घेर लिया.

परमेश्वरन बस कुछ सैकेंड तक ही अपने बेटे का हाथ पकड़े रख सके. वो याद करते हुए बताते हैं कि उनका बेटा घबरा कर ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था. तभी लहरों ने उन्हें अपने बेटे से अलग कर दिया.

परमेश्वरन ने किसी तरह से एक नारियल के पेड़ को पकड़ लिया और जब पानी कम हुआ तो वे अपने बच्चों को ढूंढने लगे, लेकिन उन्हें एक-एक करके उनकी लाशें ही मिल पाईं.

परमेश्वरन को पता चला कि उनके सात रिश्तेदार और तीन बच्चे मौत के मुँह में चले गए हैं और केवल वो ही किसी तरह से बच पाए हैं.

 मैंने उन्हें चूमा और तीन मुट्ठी रेत उनपर डालते हुए कहा कि बच्चों मुझे माफ़ करना. मैं तुम्हें ताबूत या फूल कुछ भी नहीं दे पाया
परमेश्वरन, सूनामी प्रभावित

उन्होंने बच्चों के शवों को नहलाया और उन्हें कपड़े पहनाकर अपने हाथों से उनकी क़ब्र खोदी.

बीते समय को याद करते हुए वो कहते है, "मैनें उन्हें चूमा और तीन मुट्ठी रेत उनपर डालते हुए कहा कि बच्चों मुझे माफ़ करना. मैं तुम्हें ताबूत या फूल कुछ भी नहीं दे पाया."

बच्चों की माँ चूड़ामणि सदमे के कारण कई दिनों तक कुछ भी नहीं बोल पाईं. वो कहती हैं, "पहले तो मैं अपने पति को ही कसूरवार ठहराती रही कि अगर वो उस दिन समुद्र के किनारे नहीं जाते तो आज मेरे बच्चे ज़िंदा होते."

दोनो पति-पत्नी मिल कर आत्महत्या करने की सोच रहे थे कि चूड़ामणि ने अपने पति से कहा कि उसने ईश्वर की आवाज़ सुनी है जो उसे सांत्वना दे रहे है और नई रोशनी दिखा रहे हैं.

परमेश्वरन ने पहले तो अपनी पत्नी पर मौत से डरने का आरोप लगाया, लेकिन तभी उनका ध्यान अपने तीन बच्चों की तस्वीर पर गया. उन्हें महसूस हुआ कि उनके बच्चे उनसे कह रहे हैं कि वो यीशु की गोद में ख़ुश हैं और मैं उनके लिए दुखी होना छोड़ दूं.

धर्म-परिवर्तन

परमेश्वरन एक ग़रीब चरवाहे की संतान हैं, वो एक हिंदू के घर पैदा हुए लेकिन 12 साल की उम्र में एक ईसाई के संपर्क में आने के बाद उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया. फिर उन्होंने स्कूल में दाख़िला लिया और उनकी ज़िदंगी ही बदल गई.

परमेश्वरन
यादों नई प्रैरणा और उत्साह दिया है

सूनामी की लहरों ने उनकी आस्था की परीक्षा ली लेकिन अपने दुख में डूब जाने की बजाय उन्होनें अपने समुदाय की मदद करने का फ़ैसला किया.

फरवरी की शुरुआत में नागापट्टनम का सरकारी अनाथालय पूरी तरह से भर गया था. लगभग 250 बच्चे अनाथ हो गए थे और 858 बच्चों ने अपने माता या पिता को खो दिया था.

परमेश्वरन और चूड़ामणि के पास जगह की कमी नहीं थी. उन्हें अपने ख़ाली घर में घुसते हुए घबराहट होती थी इसलिए उन्होनें अपने दरवाज़े बिना माँ बाप के बच्चों के लिए खोल दिए.

फरवरी में पहले चार बच्चे आए 12 साल की जूनिया उसकी दो छोटी बहनें और एक भाई. एक मछुआरे के इन बच्चों की माँ सूनामी लहरों की भेंट चढ़ गई थी.

परमेश्वरन ने इन बच्चों को गोद नहीं लिया है लेकिन उनका कहना है कि बच्चे जब तक चाहें उनके साथ रह सकते हैं और वह उनकी पढ़ाई और देखरेख की पूरी ज़िम्मेदारी उठा रहे हैं.

बच्चों के पिता शिवशंकर का कहना है कि वो आर्थिक और मानसिक रुप से बच्चों का पालन पोषण सही ढ़ंग से नहीं कर पा रहा था. अब उसे ख़ुशी है कि उसके बच्चों की बेहतर परवरिश हो रही है.

परमेश्वरन दंपति की योजना अब अपने घर से लगा हुआ मकान ख़रीदने की है ताकि और अधिक बच्चों को सहारा दिया जा सके. उन्होनें ‘उम्मीद के हाथ’ नाम की एक ग़ैर सरकारी संस्था की शुरुआत भी की है.

वेबसाइट

मई 2005 में पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने जब इस शहर का दौरा किया था तो उन्होंने इस दंपति से उनकी योजना पर बात करते हुए कई मिनट बिताए थे.

बिल क्लिंटन का कहना था कि ये लोग मानवता की सेवा का एक महान काम कर रहे है.

अक्तूबर 2005 तक परमेश्वरन दंपति के घर 16 बच्चे आ चुके थे जिनमें सबसे छोटे बच्चे की उम्र महज़ दो साल थी. यह सभी बच्चे मछुआरों के हैं. लोग इनसे और अधिक बच्चों को रखने की गुज़ारिश कर रहे हैं लेकिन इनके पास जगह की कमी होती जा रही है.

सुबह के समय चूड़ामणि बड़ी तेज़ी और सफाई से सभी काम निपटाती है. बड़े बच्चे साइकिल पर स्कूल जाते है जबकि छोटे बच्चों को आटोरिक्शा में भेजा जाता है, लेकिन उन्हें उम्मीद है कि एक दिन वो लोग छोटी बस ख़रीद पाएंगे.

 मैं लोगों से अक्सर कहता हूँ कि अगर हम इस दुख से बाहर आ सकते है तो कोई भी ज़िदंगी की मुसीबतों से लड़ने की हिम्मत कर सकता है
परमेश्वरन, सूनामी प्रभावित

परमेश्वरन ने अपनी कहानी को लेकर एक वेबसाइट भी शुरु की है और उन्हें पूरी दुनिया से सहायता के संदेश मिले है.

परमेश्वरन का कहना है, "मैं लोगों से अक्सर कहता हूँ कि अगर हम इस दुख से बाहर आ सकते है तो कोई भी ज़िदंगी की मुसीबतों से लड़ने की हिम्मत कर सकता है."

लेकिन आज भी रात के समय परमेश्वरन अपनी बाल्कनी में खड़े होकर समुद्र को देखते हुए अपने बच्चों के नाम पुकारते है.

वो कहते है, "एक समय था जब यह समुद्र का किनारा हमारे लिए स्वर्ग था फिर इसने नर्क का रुप ले लिया. मैं फिर भी इससे दूर नहीं जाऊंगा क्योंकि जब मैं लहरों को देखता हूँ तो अपने बच्चों को अपन पास पाता हूँ."

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