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धीरे धीरे पटरी पर लौट रही है जिंदगी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका में रहने वाले सत्यमूर्ती के चेहरे पर धीरे धीरे अब मुस्कान वापस आ रही है. पर वह कभी अपनी पत्नी और बच्चे को नहीं भूल सकेंगे. सूनामी ने दोनों को सत्यमूर्ती से छीन लिया. सूनामी के बाद से सत्यमूर्ती श्रीलंका के पूर्वी बैटीकलोव जिले के वट्ट्वन शिविर में अपने भाई के परिवार के साथ रह रहे है. शुरु में तो उन्हें बहुत कष्ट हो रहा था पर अब काम भी मिल गया है. पर सभी इन्हीं की तरह नही हैं. श्रीलंका के गॉल ज़िले में पेरालिया गाँव के लोग आज भी शिकायत कर रहे हैं. यहीं पर एक रेलगाड़ी सूनामी की चपेट आ गयी थी. इसमे 1500 से ज़्यादा यात्री मारे गये. श्रीलंका में सूनामी में मारे गए लोगों की पहली बरसी यही पर मनायी जाएँगी. रेल दुर्घटना
रेलगाड़ी के चार डिब्बे पटरी पर ही वापस रखे गए हैं. ये जगह एक स्मारक सी बन गई है जहाँ हर दिन सैकडों यात्री इसे देखने आते है. मगर पेरालिया के आसपास रहने वाले लोग यहाँ पर आने वाले यात्रियों से पैसे माँगते हैं. इन लोगों का कहना है कि सरकार ने इन्हें कुछ नही दिया है. 45 वर्षीय नडा पहले लेबनान में काम करती थी. सूनामी में उनके परिवार के 6 लोग मारे गये थे. वो अब पेरालिया की रेल की पटरी के पास आकर पैसे माँगती है. "सूनामी ने हमें भिखमंगा बना दिया है और सरकार ने कुछ नहीं दिया. केवल चार महीने तक 5000 रुपये दिए. हर मरने वाले के नाम पर 15,000 रुपए दिए. और क्या मिला हमें? यहां खड़े होकर भीख मांग रहे हैं." इस तरह की आपबीती श्रीलंका के तटीय इलाक़े मे हर जगह सुनने को मिलती है. सुनामी में श्रीलंका में 32000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और लगभग पाँच लाख लोग बेघर हो गये थे. अब श्रीलंका सरकार का कहना है कि 95% लोगों को अस्थायी मकान मिल चुके हैं. पुनर्वास साल भर के अंदर पुर्नवास का काम भी हुआ है. ब्रितानी गैर सरकारी संगठन ऑक्सफ़ैम की एक रिपॊर्ट के अनुसार सूनामी की चपेट मे आए देशों मे लगभग 50% लोगों को किसी न किसी तरह का रोज़गार मिल गया है. श्रीलंका में ऑक्स्फ़ैम की प्रोग्राम निदेशक जॊन सम्मर्स का कहना है कि अभी और भी बहुत सारी चुनौतियाँ हैं. वे कहते हैं, "जिस काम को हमने शुरु किया है उसे आगे बढ़ाना है. हम सरकार से अनुरोध कर रहे हैं कि वो बफ़र ज़ोन समाप्त कर दे ताकि वो लोग जो समुद्र के किनारे रह्ते थे वो वापस उसी जगह पर अपने मकान बना सकें." श्रीलंका सरकार ने दक्षिण में समुद्र से 100 मीटर और पूर्व में 200 मीटर तक के क्षेत्र को बफ़र ज़ोन घोषित किया है. इस क्षेत्र में मकान बनाने पर पाबन्दी है. ये एक बड़ा मुद्दा बन गया है क्योंकि ज़्यादातर लोग मछुआरे हैं और वो समुद्र से दूर नहीं रहना चाह्ते हैं. मगर समुद्र के पास और बफ़र ज़ोन से बाहर ज़मीन उप्लब्ध नही हैं. जो ज़मीन सरकार ने आवंटित की है वो समुद्र से बहुत दूर है और ये परिवार वहाँ नही जाना चाहते है. विस्थापितों के पुनर्वास के लिए 85,000 मकान चाहिए, पर एक साल में मात्र 5000 ही बन पाए हैं. बाकी के मकान भी गैर सरकारी संगठन ही बना रहे हैं. अनुमान है कि यह काम पूरा होने मे अभी दो साल तक लग सकते हैं. लोगों के चेहरों पर मुस्कान भले ही लौट आई हो पर परिवारजनों के मारे जाने का दुख और बेघर हो जाने से बने घाव भरने मे अभी बहुत साल लग जाएँगे. | इससे जुड़ी ख़बरें मौसम का मिज़ाज समझने की पहल20 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'दो तिहाई लोग काम पर लौट चुके हैं'20 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस एक साल बाद भी नहीं हो पाई पहचान19 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस सूनामी का दर्द, उस पर बाढ़ की मार19 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस ऐसे दिया मौत को चकमा18 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस चेतावनी प्रणाली बनाने की दिशा में प्रगति14 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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