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एक साल बाद भी नहीं हो पाई पहचान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सूनामी आने के एक साल बाद भी थाईलैंड में सैकड़ों शवों की अब तक पहचान नहीं हो पाई है. कई लोगों के रिश्तेदार सूनामी के बाद से गुमशुदा हैं और उनके मारे जाने की आशंका है. मृतकों के शवों की पहचान के लिए ये इंतज़ार रिश्तेदारों के लिए बेहद दर्दनाक और लंबा साबित हो रहा है. थाईलैंड में रहने वाली युपिन कई महीनों से अपने नौ साल के बेटे का शव ढूँढ रही हैं. उन्होंने बताया, “मैं अब तक अधिकारियों को पाँच तरह के नमूने दे चुकी हूँ.” इन नमूनों में गुमशुदा व्यक्ति के बाल, किताबें और यहाँ तक की उसका टुथब्रश भी शामिल है- यानि हर वो चीज़ जिसकी मदद से मृतक के शव की पहचान हो पाए. जटिल प्रक्रिया
पिछले साल सूनामी आने के बाद, पहले कुछ दिनों तक तो थाईलैंड में लोग मुर्दाघरों में आकर सीधे उन लोगों के शव ले जाते थे जिन्हें वे पहचानते थे. लेकिन अब स्थिति वैसी नहीं है. करीब 35 देशों से आए विशेषज्ञों का दल मृतकों की पहचान करने में मदद कर रहा है. मृतकों की पहचान स्थापित करने का अपनी तरह का ये सबसे बड़ा अभियान माना जा रहा है. पहचान केंद्र के प्रमुख ने माना कि पहचान की प्रकिया काफ़ी लंबी है और उन्हें ग़लती से भी बचना होता है. ये प्रकिया और भी जटिल हो जाती है अगर शव बुरी तरह क्षत विक्षत हो चुका हो. पहचान केंद्र के अधिकारी हॉवर्ड वे ने बताया कि डीएनए के सहारे शवों की पहचान हो सकती है लेकिन कई थाई परिवार ऐसे हैं जिनके सभी सदस्य मारे गए हैं. ऐसा कोई सदस्य नहीं है जिसका डीएनए नमूना लिया जा सके. दिक्कतें पहचान केंद्र को शवों की पहचान में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, ख़ासकर तब जब गुमशुदा लोगों के बारे में ग़लत जानकारी दी जाती है. पहचान केंद्र के अधिकारी वे बताते हैं, “कई बार ऐसा हुआ है जब हमारा दल गुमशुदा व्यक्ति के रिश्तेदार के घर उनका डीएनए का नमूना लेने गया और ख़ुद गुमशुदा व्यक्ति ने ही दरवाज़ा खोला.” केंद्र अधिकारी का कहना है कि करीब 100 शव ऐसे हैं जिनकी पहचान हो चुकी है लेकिन शवों को लेने अब तक कोई नहीं आया है. उन्होंने बताया कि थाईलैंड के उत्तर-पूर्व में रहने वाले लोगों के लिए केंद्र तक आना मुश्किल होता है. बर्मा के नागरिकों को अलग तरह की दिक्कत का सामना कर पड़ रहा है. रिश्तेदारों को शव सौंपने से पहले, थाई अधिकारियों को मृतकों के देश के अधिकारियों से कई दस्तावेज़ों की ज़रूरत होती है. लेकिन रोज़ी रोटी के लिए बर्मा छोड़कर दूसरे देशों में जाकर रहने वाले लोगों को बर्मा की सैनिक सरकार बर्मा का नागरिक नहीं मानती. धूमिल होती उम्मीद अभी तक करीब 3000 शवों की पहचान हो पाई है. इन लोगों की पहचान उनके दाँतों, डीएनए और उंगलियों के निशान से हुई. इनमें से ज़्यादातर विदेशी नागरिक थे. पहचान केंद्र के अधिकारी हॉवर्ड वे ने बताया कि स्वीडन के सभी लोगों के डीएनए के बारे में जन्म के समय ही जानकारी इकट्ठा कर ली जाती है. इस कारण स्वीडन के लोगों की पहचान में आसानी हुई. जबकि कई थाई लोगों की पहचान उनके पहचान पत्र से हुई. थाईलैंड में 15 वर्ष की उम्र में लोगों का पहचान पत्र बनता है जिसमें उनके उंगलियों के निशान होते हैं. पहचान केंद्र अभी एक साल और काम करेगा. केंद्र के प्रमुख ने बताया कि उसके बाद स्थिति का जायज़ा लिया जाएगा. उन्होंने कहा कि अगर शवों को दफ़नाने का फ़ैसला हुआ तो उन्हें एम्बाम किया जाएगा यानि रयासनों का लेप लगाया जाएगा. ऐसा इसलिए किया जाएगा ताकि बाद में मृतक के बारे में जानकारी मिले तो शव को निकाला जा सके. जैसे जैसे समय बीत रहा है, रिश्तेदार धीरे धीरे ये मानने लगे हैं कि शायद उन्हें अपने प्रियजनों के अवशेष कभी न मिलें. | इससे जुड़ी ख़बरें दो पूर्व राष्ट्रपति सूनामी प्रभावित देशों में19 फ़रवरी, 2005 | पहला पन्ना सूनामी में मृतकों की संख्या बढ़ी19 जनवरी, 2005 | पहला पन्ना 'संयुक्त राष्ट्र को आधी रकम ही मिल पाई'26 जनवरी, 2005 | पहला पन्ना इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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