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गुरुवार, 22 दिसंबर, 2005 को 13:46 GMT तक के समाचार
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जब किसी ने नहीं की मदद तो..

महिलाएँ
सूनामी के बाद परांगीपट्टई के दलितों ने अपनी मदद ख़ुद करने की पहल की
सूनामी की लहरें भी तमिलनाडु के ग्रामीण समाज में गहरी पैठ बना चुकी जात-पात की जड़ों को मिटा नहीं सकीं हैं.

विनाशकारी लहरों के कहर मचाकर गुज़र जाने के बाद राहत और पुनर्वास का काम शुरू हुआ तो दलितों की आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था.

कडलूर ज़िले के परांगीपट्टई ब्लॉक में रहने वाले दलित नौजवानों को जल्द ही बात समझ में आ गई कि उन्हें ख़ुद ही कुछ करना होगा.

स्थानीय पत्रकार से सामाजिक कार्यकर्ता बने दलित नौजवान एस मोहन ने सुनामी के फ़ौरन बाद के दिनों को याद करते हुए बताया,"हमने देखा कि हमारे समुदाय के लोगों के साथ भेदभाव ही नहीं, घोर अन्याय हो रहा है, उन्हें सुनामी के बाद तीन-चार दिनों तक कहीं से खाना-पानी नहीं मिला."

माडाकोइल गाँव में रहने वाले एक अन्य दलित मुथु ने बताया, "हमारे घर बह गए थे लेकिन हमें टेम्पररी शेल्टर में ऊँची जाति वालों ने घुसने नहीं दिया. शुरू के कुछ दिन हमने बहुत मुश्किल से गुज़ारे."

पहल

इसके बाद सोशल अवेयरनेस सोइसाइटी फॉर यूथ(ससी)नाम की संस्था चलाने वाले एस मोहन और उनके साथियों ने मिलकर दलितों के राहत और पुनर्वास का बीड़ा उठाया.

 हमारा इरादा लोगों को खाना खिलाने का नहीं बल्कि उन्हें खुद कमाने लायक बनाने का है
एस मोहन, सामाजिक कार्यकर्ता

भूमिहीन मज़दूर, छोटे मछुआरे और कुली का काम करने वाले दलितों को इससे मामूली राहत मिली. लेकिन संगठन के प्रोग्राम कॉर्डिनेटर एन सेल्वगणपति बताते हैं कि "काम बहुत बड़ा था और हमारे पास इतने साधन नहीं थे."

ऐसे में इंग्लैंड की कल्याणकारी संस्था ऑक्सफ़ैम ने मदद का हाथ आगे बढ़ाया. ऑक्सफ़ैम की सहायता से ससी ने परांगीपट्टई के छह दलित बहुल गाँवों में काम करने की ज़िम्मेदारी संभाली है.

भारत में सुनामी राहत की देखरेख कर रहे ऑक्सफ़ैम के अशोक प्रसाद कहते हैं,"ये लोग काफ़ी अच्छा काम कर रहे हैं,ये खुद उसी समुदाय से आते हैं इसलिए उन्हें ज़रूरतों के बारे में अच्छी तरह पता था."

कडलूर में सूनामी राहत के प्रभारी सरकारी अधिकारी एस शणमुगम भी कहते हैं,"एक सीमित दायरे में ही सही लेकिन ये लोग काफ़ी काम कर रहे हैं."

रोज़गार

ससी ने अब तक मछली मारने के लिए इस्तेमाल होने वाले 22 नावें ज़रूरतमंद लोगों को दी हैं. इन बोटों पर इंजन लगा है और साथ ही जाल भी दिया गया है.

लगभग डेढ़ लाख रूपए की क़ीमत वाली एक बोट की मिल्कियत पाँच परिवारों के बीच बाँटी गई है.ये लोग नाव की देखभाल करते हैं और उससे होने वाली कमाई को आपस में बराबर बाँटते हैं.

इस तरह 22 बोटों से 110 परिवारों का गुज़ारा चल रहा है. ऐसी ही एक बोट के हिस्सेदार रामन्ना कहते हैं,"पहले हम तो नाव वालों का बोझा उठाते थे लेकिन हमारी अपनी नाव है, ऊँची जाति वाले हमारी तरक्की से जल रहे हैं."

एस मोहन बताते हैं,"हमारा इरादा लोगों को खाना खिलाने का नहीं बल्कि उन्हें खुद कमाने लायक बनाने का है.”

ससी की मदद से चाय की छोटी सी दुकान चला रही कविता कहती हैं कि इस संगठन की मदद की वजह से ही वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकी हैं.

इस संगठन की योजना डेढ़ लाख रूपए की लागत से दलितों के लिए पक्के मकान बनाने की भी है. इस योजना के प्रभारी सेल्वगणपति बताते हैं कि बारिश की वजह से निर्माण कार्य बाधित हुआ है लेकिन अगले वर्ष अप्रैल तक 40 घर तैयार हो जाएँगे.

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