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श्रीलंका सरकार को एलटीटीई की चेतावनी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
श्रीलंका में एलटीटीई ने नयी सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर जल्द ही विवाद का राजनीतिक हल न निकाला गया तो संघर्ष तेज़ कर दिया जाएगा. अपने वार्षिक नीतिगत बयान में एलटीटीई के प्रमुख प्रभाकरन ने कहा कि तमिल लोगों ने अब उम्मीद छोड़ दी है और उनके संयम का बाँध टूट गया है. प्रभाकरन ने कहा, "यह हमारी आख़िरी अपील है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम स्वशासन के लिए संघर्ष तेज़ करेंगे." एक सप्ताह पहले ही राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद महिंदा राजपक्षे ने एलटीटीई के साथ शांति वार्ता की समीक्षा की बात कही थी. महिंदा राजपक्षे ने कहा था कि लंबे समय से चल रहे इस संघर्ष का हल एकीकृत राष्ट्र के रूप में ही स्वीकार हो सकता है. उम्मीद उन्होंने एलटीटीई की स्वतंत्र राज्य की मांग को अस्वीकार कर दिया था. एलटीटीई नेता प्रभाकरन ने कहा कि नीति के स्तर पर उनके और राष्ट्रपति राजपक्षे के बीच गहरे मतभेद हैं. प्रभाकरन ने कहा कि चूँकि राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को यथार्थवादी माना जाता है इसलिए हम जानना चाहते हैं कि वे शांति प्रक्रिया से कैसे निपटना चाहते हैं. प्रभाकरन ने कहा कि राष्ट्रपति राजपक्षे की सरकार को चाहिए कि वह एक ऐसा राजनीतिक ढाँचा सामने लाए जिससे तमिल लोगों की राजनीतिक आकांक्षाएँ पूरी हो सके. उन्होंने कहा, "अगर नयी सरकार हमारी अपील को ठुकरा देती है तो अगले साल हम अपने लोगों के साथ मिलकर स्वशासन के लिए अपना संघर्ष तेज़ कर देंगे. हमारे लोगों ने अब संयम खो दिया है और वे निराश हो गए हैं. अब वे इसे ज़्यादा बर्दाश्त नहीं कर सकते." एलटीटीई प्रमुख प्रभाकरन ने कहा कि पिछले चार सालों से चल रही शांति प्रक्रिया ने उन ज़रूरतों की अनदेखी की है जिसके कारण लाखों तमिल शरणार्थी प्रभावित हैं.
उन्होंने कहा कि तमिल विद्रोहियों ने पिछले साल ही स्वतंत्रता संघर्ष शुरू करने का मन बना लिया था और उसके लिए तैयारी भी जारी थी लेकिन सूनामी के क़हर के कारण हज़ारों लोग मारे गए और विद्रोही इस संकट से निपटने में जुट गए. वर्ष 2002 में श्रीलंका सरकार और एलटीटीई के बीच नॉर्वे की मध्यस्थता से शांति समझौता हुआ था और इसके कारण 20 वर्षों से जारी संघर्ष रुक गया था. लेकिन कई बार एलटीटीई और सरकार के बीच बातचीत रुकी और फिर शुरू हुई. इस कारण शांति प्रक्रिया पर काफ़ी असर पड़ा. राष्ट्रपति का पद संभालने के बाद महिंदा राजपक्षे ने कहा है कि नयी शांति प्रक्रिया की आवश्यकता है जिसमें 'आतंकवाद' को सहन नहीं किया जाएगा. लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें 'युद्धविराम की समीक्षा की जानी चाहिए'25 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस विक्रमनायके श्रीलंका के प्रधानमंत्री नियुक्त21 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'सम्मानजनक तरीके से शांतिबहाली'19 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव में राजपक्षे जीते17 नवंबर, 2005 | भारत और पड़ोस नॉर्वे में बातचीत से इनकार25 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस सरकार एलटीटीई से वार्ता के लिए तैयार19 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस तमिल विद्रोही बातचीत पर राज़ी18 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस श्रीलंका में आपातकाल की अवधि बढ़ी18 अगस्त, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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