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बिहार में राजनीति का अपराधीकरण | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बिहार और उत्तरप्रदेश ऐसे राज्य हैं जिन्होंने राजनीति में अपराधीकरण रोकने की बहस को राष्ट्रव्यापी कर दिया है. उत्तरप्रदेश में यह समस्या उतने नग्न रूप में नहीं है, जितनी बिहार में है. बिहार में आमधारणा है कि यहाँ का सबसे शक्तिशाली वर्ग ही अपराधी वर्ग है. बिहार की सरकारी मशीनरी में भले ही कोई तालमेल न हो, लेकिन अपराधियों में तालमेल है. उनका नेटवर्क सबसे संगठित और सबसे विशाल है. यह इतना ताक़तवर है कि बिहार में हाईकोर्ट को कई बार सख़्त लेकिन बेबस टिप्पणियाँ तक करनी पड़ी. ‘पुलिस थानों में सो रही है और अपराधी सरकार चला रहे हैं, हर नागरिक अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा है और सरकार झूठ पर झूठ बोले जा रही है.’ ‘आख़िर वे कौन लोग हैं जो अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं. संविधान ने नागरिकों को जो अधिकार दिए हैं, उससे उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता.’ क्या ऊपर की दोनों टिप्पणियाँ देश के संवेदनशील लोगों को झकझोरने की ताक़त नहीं रखती. क्या किसी को याद है कि विश्व में किसी भी न्यायालय ने किसी सरकार के बारे में ऐसी राय दी हो ? ‘बिहार में जंगलराज है’. ‘हम बिहार में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश कर सकते हैं,’ ‘राज्य सरकार उन लोगों के नाम बताए जिनका संरक्षण अपराधियों को मिल रहा है.’ ये टिप्पणियाँ देखने में सख़्त हैं लेकिन हैं बेबसी भरी. इनका न आज तक बिहार की सरकार ने कोई उत्तर दिया और न ही कभी कोई सरकार देगी. आज का बिहार कल के हिंदुस्तान की तस्वीर है क्योंकि 80 के दशक में जब इसकी शुरूआत हुई थी तब बिहार में इसके ख़िलाफ़ कोई सशक्त आवाज़ नहीं उठी थी. उन दिनों अपराधियों का साथ राजनीतिज्ञों को काफी भला लगा था क्योंकि इससे उन्हें पैसा तो मिलता ही था, छोटे स्तर पर सम्मान भी मिलता था और वे रूतबे वाले माने जाते थे. अपने विरोधियों की हत्या करवाने में भी अपराधियों का इस्तेमाल होने लगा. पहले थोड़ी हत्याएं हुईं. बाद में इतनी बढ़ गईं कि सभी राजनीतिज्ञ डरने लगे कि कब कोई उन्हें मौत की नींद सुला दे. सिक्के के दो पहलू दरअसल बिहार में राजनीति और अपराध सिक्के के दो पहलू हैं. जो नेता हैं वही अपराधी हैं और जो अपराधी हैं वही नेता हैं. शायद ही कोई नेता कहे कि उसका संबंध अपराधियों से नहीं है. स्थिति यहां तक बिगड़ने लगी है कि माना जाने लगा है कि जितना बड़ा नेता, उनता बड़ा अपराधी. अपराधियों के लिए बिहार में राजनीति एक ऐसा रास्ता है जो धन के साथ वर्चस्व भी दिलाता है, यह यहाँ एक उद्योग के रूप में स्थापित हो चुका है. यह उद्योग अपराधियों को पैसा भी दिलाता है. सरकारी सुविधाएं भी सारे आपराधिक कार्यों के बाद क़ानून के शिकंज़े से बच निकलने की सुविधा भी यह उद्योग ही इन्हें उपलब्ध कराता है. महात्मा गाँधी ने आज़ादी के आंदोलन का प्रारंभ भी बिहार के चंपारण से किया था. देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद भी यहीं के थे. लोकनायक जयप्रकाश ने आज़ादी के आंदोलन में क्रांतिकारी जान फूंकी थी तथा बाद में देश के प्रसिद्ध छात्र आन्दोलन का नेतृत्व किया था. पर अब ये इतिहास की बातें हैं. जयप्रकाश नारायण के पराभव के साथ बिहार में वे ताक़तें ऊपर आ गईं जो नैतिक शक़्ति के दबाव में थमी हुई थीं. शायद इन आपराधिक ताक़तों को लगा कि जब हमारी वजह से राजनीतिज्ञों को पैसा मिलता है,उन्हीं की मदद से वे जीतते हैं, उन्हीं की मदद से वे अपना दबदबा कायम करते हैं तो क्यों न वे स्वयं आगे आकर राजनीति को अपने कब्ज़े में लें. अब यह एक हक़ीकत बन चुका है. | इससे जुड़ी ख़बरें एक बार फिर त्रिकोणीय चुनावी दंगल15 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस बिहार यूपीए के लिए कठिन चुनौती15 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस मनमोहन सिंह इस्तीफ़ा दें: आडवाणी14 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'कोर्ट में हराया, वोट में भी हराएंगे'07 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'विधानसभा भंग करना असंवैधानिक था'07 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस रविशंकर प्रसाद ख़तरे से बाहर06 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस बूटा सिंह को वापस बुलाने की माँग03 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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