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'...वरना समाज का एक बड़ा हिस्सा अपंग दिखेगा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चिकित्सा विशेषज्ञ और समाजसेवी मानते हैं कि इस समय घायलों का उपचार करना प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि यदि इस समय ऐसा नहीं किया गया तो उनकी हालत बिगड़ सकती है. वे मानते हैं कि अब उपचार में जितनी देर होगी घायलों को अपंग होने की आशंका उतनी ही बढ़ती जाएगी क्योंकि बिना उपचार संक्रमण का ख़तरा बढ़ता जाएगा और अंग काटने पड़ सकते हैं. उल्लेखनीय है कि आठ अक्तूबर को आए भूकंप में पाकिस्तान में कम से कम 54 हज़ार लोगों की मौत हुई है जबकि भारत में 1300 से अधिक लोगों की जानें गई हैं. पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से मंगलवार को ऐसी ख़बरें आईं थीं कि वहाँ घायलों की हालत अब ख़राब होती जा रही है. भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. चंद्रकांत एस पांडव कहते हैं कि अब सहायता न पहुँची तो यह देरी जानलेवा भी हो सकती है. भुज में आए भूकंप के दौरान सक्रिय रुप से राहत कार्य कर चुके वागड़ सर्वोदय ट्रस्ट के ट्रस्टी दीपक मेपानी कहते हैं कि सेना जो सहायता कर रही है वह तारीफ़ के क़ाबिल तो है लेकिन सिर्फ़ उसी के भरोसे काम नहीं चलने वाला है. कमांडो ऑपरेशन की ज़रुरत कम्युनिटी मेडिसिन के विभागाध्यक्ष डॉ पांडव का कहना है कि अगर अब तत्परता से सहायता नहीं पहुँचाई गई तो मुश्किल होगी.
वे मानते हैं कि जैसी आपदा आई है उससे स्पष्ट है कि वहाँ लोगों की हालत ख़राब होगी और उपचार की व्यवस्था युद्ध स्तर पर करने की आवश्यकता होगी. उनका मानना है कि वैसे भी बहुत सी बाधाओं के बाद जैसी सुविधाएँ वहाँ पहुँची हैं वह देर से पहुँची हैं. बीबीसी से हुई बातचीत में डॉक्टर पांडव ने कहा कि सूनामी के अनुभव के बाद भारत सरकार ने आपातकालीन सहायता की योजना तो बना ली है लेकिन अभी भी आपदा की स्थिति में सहायता के लिए जो तेज़ी दिखाई जानी चाहिए वह अभी नहीं दिखती. उनका कहना है कि देरी होने से घायलों की हालत ख़राब होने लगती है और जब वे पीड़ा झेलते हैं तो उन्हें महसूस होने लगता है कि इस धीमी और रोज़-रोज़ की मौत से तो एक बार की मौत ही भली थी. मानवीय सहायता सामाजिक कार्यकर्ता दीपक मेपानी कहते हैं कि सेना जो सहायता कर रही है वह तो ठीक है लेकिन वह अकेले पर्याप्त नहीं है. उन्होंने भुज में काम के अपने अनुभव से कहते हैं कि दस-ग्यारह दिनों का समय लंबा समय होता है और कई मामले अभी भी बहुत बिगड़ गए होंगे. उन्होंने कहा, "हम भुज में कुछ जगह देरी से पहुँच सके और पाया कि जिन लोगों के हाथ-पैर बचाए जा सकते थे उनको भी काटना पड़ा." उन्होंने कहा कि इस स्थिति से बचने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा डॉक्टरों को वहाँ पहुँचाया जाना चाहिए ताकि लोगों को जितनी ज़्यादा और जल्दी सहायता मिल सकती हो मिल जाए.
वे बताते हैं कि भूकंप में ज़्यादातर घायलों की हड्डी टूटी होती है. दीपक मेपानी कहते हैं, "वहाँ तुरंत ऑपरेशन थिएटर बनाए जाने चाहिए और इलाज शुरु करने चाहिए क्योंकि यदि देरी हुई तो समाज का एक बड़ा हिस्सा आने वाले दिनों में अपंग दिखाई देगा." समाज के सवाल पर उन्होंने कहा कि चुनौती जितनी दिखाई पड़ रही है उससे ज़्यादा गंभीर है क्योंकि आम बीमारियों की तुलना में भूकंप के घायलों का इलाज देर तक चलता रहता है. वे बताते हैं कि भुज में कई घायलों का इलाज, ख़ासकर रीढ़ की चोट वाले मरीज़ों का इलाज तो अभी तक चल रहा है. दीपक मेपानी डॉक्टरों का एक दल लेकर जम्मू-कश्मीर जाने के लिए तैयार हैं और सेना की स्वीकृति का इंतज़ार कर रहे हैं. |
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