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आरक्षण राजनीतिक फ़ैसला नहीं था: फ़ातमी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) एक स्वायत्तशासी विश्वविद्यालय है और उसे स्वतंत्र फ़ैसला करने का अधिकार है. पिछले दिनों एएमयू ने 50 फ़ीसदी आरक्षण मुसलमानों को देने की व्यवस्था की जिसे मानव संसाधन मंत्रालय ने स्वीकार किया था. 1981 में संसद ने एएमयू को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का दर्जा दिया था जिसका सभी ने स्वागत किया था. उसके बाद से विश्वविद्यालय अपने नियम निर्धारित करता है और स्वतंत्र रूप से फ़ैसले लेता है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने अपने स्तर और प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए मुसलमानों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था. लेकिन ये आरक्षण ऐसे ही नहीं भरा जाना था बल्कि प्रतिस्पर्धा से भरे जाने की व्यवस्था की गई थी. पर हाईकोर्ट का फ़ैसला आया और उसने एएमयू के मूल अल्पसंख्यक चरित्र पर ही सवाल उठा दिया. साथ ही उसने 50 फ़ीसदी आरक्षण पर भी सवाल खड़ा कर दिया है. मेरा मानना है कि एएमयू के मूल चरित्र पर चर्चा करने की ज़रूरत नहीं है. संसद इस बारे में पहले ही व्यवस्था दे चुकी है. जहाँ तक आरक्षण का सवाल है तो यह एनडीए की हुकूमत में भी हुआ था. जामिया हमदर्द में भी 50 प्रतिशत आरक्षण की अनुमति दी गई थी. इसलिए यह कोई राजनीतिक फ़ैसला नहीं है. हम अदालत के फ़ैसले का अध्ययन कर रहे हैं और यह देखेगे कि क़ानून के दायरे में रहकर क्या क़दम उठाए जाएं. वैसे इस मामले में मुख्य भूमिका विश्वविद्यालय की है. ( रेहान फ़जल से बातचीत पर आधारित) |
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