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बुधवार, 05 अक्तूबर, 2005 को 10:10 GMT तक के समाचार
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क़बायली नेताओं की जीत के आसार
अफ़ग़ानिस्तान में मतगणना
अफ़ग़ानिस्तान में संसद की 249 सीटों के लिए 18 सितंबर को मतदान हुए थे
अफ़ग़ानिस्तान में सितंबर में हुए संसदीय चुनावों के नतीजे आने लगे हैं और संकेत मिल रहे हैं कि कई पुराने क़बायली नेता जीतकर संसद में पहुँचने वाले हैं.

अधिकारियों का कहना है कि संसदीय सीटों के लिए मतगणना लगभग पूरी हो चुकी है और संभावना है कि गुरुवार को परिणाम घोषित कर दिए जाएँगे.

जब संसद के चुनाव हुए थे तो साथ में प्रांतीय परिषदों के लिए भी चुनाव हुए थे लेकिन पूरे नतीजे आने में 22 अक्तूबर तक का समय लगेगा.

इन चुनावों के दौरान अफ़ग़ानिस्तान में बहुत से लोगों ने कहा था कि उनकी अपेक्षा है कि संसद में वो लोग जीतकर न आएँ जिनका पिछले तीन दशक के युद्ध से कोई नाता रहा है.

ज़ाहिर है कि वे क़बायली नेताओं और उनके कमांडरों के चुनाव जीतने के ख़िलाफ़ थे.

इन क़बायली नेताओं और कमांडरों को जब चुनाव लड़ने से नहीं रोका गया था तो भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े सवाल खड़े किए गए थे.

दाग़दार व्यक्तित्व

अफ़ग़ानिस्तान के इन चुनावों में राष्ट्रपति चुनाव की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत कम मतदान हुआ था और मत का प्रतिशत 50 तक ही पहुँच सका था.

क़बायली लड़ाके
लोगों का मानना था कि संसद में उन्हें ही पहुँचना चाहिए जिनकी पृष्ठभूमि साफ़ सुथरी हो

चुनाव आयोग के अधिकारी सुल्तान अहमद बहीन ने बीबीसी को बताया कि हेरात, ख़ोस्त और पक्तिया के अलावा शेष प्रांतों में मतगणना का काम पूरा हो गया है.

उन्होंने बताया कि चुनाव आयोग का एक विशेष समीक्षा आयोग बनाया गया है जो चुनाव में कथित गड़बड़ियों की शिकायतों की जाँच कर रहा है हालाँकि उनका कहना है कि कुछ छोटे मतगणना केंद्रों में गड़बड़ियों की शिकायतें आईं थीं.

लेकिन इस बीच मिले परिणामों से संकेत मिल रहे हैं कि कई क़बायली नेता जीतकर संसद में पहुँचने वाले हैं.

इनमें अब्दुल रसूल सयाफ़ भी शामिल हैं जिनके बारे में आरोप है कि उनके ताल्लुक़ात अलक़ायदा से हैं. जीतने वाले दूसरे विवादित नेता हज़रत अली हैं जिनका संबंध पुराने लड़ाकों से रहा है.

ख़ुद चुनाव लड़ रहे कुछ उम्मीदवार भी इन क़बायली नेताओं के चुनाव लड़ने का विरोध करते रहे हैं. इनमें मालालाई जोया भी थीं.

संकेत हैं कि वे भी चुनाव जीत गई हैं. उल्लेखनीय है कि महिलाओं के लिए इन चुनावों में 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई थीं.

इन चुनावों का तालेबान विरोध कर रहे थे. अफ़ग़ानिस्तान पर इससे पहले शासन करने वाले तालेबान अब भी दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान के प्रांतों में बेहद प्रभावशाली माने जाते हैं.

हालाँकि चुनावों के दौरान हिंसा की घटनाएँ अपेक्षाकृत कम हुई थीं और इसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने तालेबान और उनको समर्थन करने वाले चरमपंथियों की पराजय के रूप में देखा था.

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