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अफ़ग़ानिस्तान में चुनावी माहौल?

अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव
भारत जैसा चुनावी माहौल नहीं नज़र आता
झंडे बैनर से सजी गाड़ियाँ और उस पर लगा लाउडीस्पीकर का पोंगा जो लगातार किसी नेता का प्रचार उगल रहा हो.

या किसी खाली मैदान पर बैनर पोस्टर टँगे हों और लोग किसी नेता के आने का इंतज़ार कर रहे हों.

या फिर सड़क चलते किसी जगह थोड़ी भीड़भाड़ दिखे तो पता चले कि किसी उम्मीदवार का दफ़्तर है और कार्यकर्ता जुटे हुए हैं.

काबुल और आसपास के इलाक़ों में अभी भी ये एक दुर्लभ दृश्य है. वह भी तब जब संसदीय और प्रांतीय परिषदों के चुनावों को गिनती के दिन बचे हों.

18 सितंबर को वोट डाले जाने हैं.

दीवारें चुनावी पोस्टरों से पटी हुई हैं. और सिर्फ़ दीवारें ही क्यों जहाँ जगह मिली वहीं पोस्टर चिपका दिए गए हैं. बिजली के खंभों पर, पेड़ों पर, साइन बोर्ड पर और तो और पेट्रोल पंप की मशीनों पर भी.

और हो भी क्यों न उम्मीदवारों की संख्या इतनी भारीभरकम है कि जगह ही कम बच रही है.

संसद यानी वोलेसी जिरगा की 249 सीटों के लिए 2800 उम्मीदवार हैं तो 34 प्रांतीय परिषदों के लिए 3000 उम्मीदवार.

हालत ये है कि आम लोगों में कोई नहीं बता पा रहा है कि कौन चुनाव लड़ रहा है. एक उम्मीदवार डा फरीदा मामंद से मिलने हम पहुँचे तो उसके पड़ोसी ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम कि वे कहाँ रहती हैं. बावजूद इस तथ्य के कि वे शिशु रोग की बड़ी चिकित्सक हैं.

लोकतंत्र का सवाल

भारत के चुनाव नज़दीक से देखने की वजह से बार बार इस चुनाव की तुलना करता रहा लेकिन वो व्यर्थ था क्योंकि आख़िरकार ये अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना के लिए पहले चुनाव हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव

लेकिन क्या अफ़ग़ानिस्तान तीन दशक तक युद्ध की विभीषिका और लगभग एक दशक तक तालेबान सरकार की तानाशाही झेलने के बाद वास्तव में लोकतंत्र के लिए तैयार है?

काबुल यूनिवर्सिटी में क़ानून और राजनीति विभाग के प्रोफ़ेसर वादिर सफ़ी कहते हैं, “हम पिछले तीस साल से कई तरह के युद्ध में रहे हैं, आतंकवाद झेलते रहे हैं और अभी भी युद्ध की स्थिति ख़त्म नहीं हुई है इसलिए अभी जो लोकतंत्र आएगा उसे सही मायनों में लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता.”

वे कहते हैं, “अभी तो हालत ये है कि काबुल से बाहर लोगों को चुनाव प्रक्रिया की भी ठीक ठीक जानकारी नहीं है.”

हिंदू सिख समुदाय के प्रतिनिधि रवींदर सिंह कहते हैं कि हुक्मरानों को अभी भी समझ में नहीं आ रहा है कि वे चाहते क्या हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “अभी तो ये लोग आए हैं और कह रहे हैं कि हमें डेमोक्रेसी (लोकतंत्र) चाहिए लेकिन वो जानते भी नहीं कि उन्हें कैसा लोकतंत्र चाहिए.”

वे शिकायत करते हैं कि नए संविधान में हिंदू सिख अल्पसंख्यकों के लिए कोई आरक्षण नहीं दिया गया.

दिक़्क़तें

डॉ सफ़ी कहते हैं कि लोकतंत्र की बहाली के प्रयास अच्छे हैं लेकिन अभी तो ये सिर्फ़ आँकड़ों के आधार पर हो रहे हैं.

वे उदाहरण देकर कहते हैं कि अभी ये भी नहीं पता कि अफ़ग़ानिस्तान की जनसंख्या कितनी है, एक अनुमान है जो संयुक्त राष्ट्र ने अपने सीमित संसाधनों से लगाया है.

अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव

इस बात की पुष्टि हुई जब उम्मीदवार डॉ फ़रीदा मामंद ने कहा कि उन्हें नहीं मालूम की उनके मतदाताओं की संख्या कितनी है.

चुनाव पार्टी के आधार पर नहीं हो रहे हैं इसलिए हर उम्मीदवार का अपना एक अलग चुनाव चिंह है.

चूँकि अफ़ग़ानिस्तान की 80 प्रतिशत जनता को पढ़ना लिखना नहीं आता इसलिए उन्हें वोट देने के लिए अपने उम्मीदवार की फ़ोटो पहचाननी होगी.

चर्चित उम्मीदवार होने के बावजूद बशर दोस्त मानते हैं कि ये दिक्क़त का मामला तो है ही.

मीडिया

लोकतंत्र की स्थापना और उसे चलाने में मीडिया की एक सकारात्मक भूमिका हो सकती है लेकिन अभी अफ़ग़ानिस्तान में ऐसी स्थिति नहीं बनी है.

पाँच अख़बारों में से दो सरकारी हैं और दो साप्ताहिक एक दैनिक है भी तो उसे राजनीति, ख़ासकर चुनाव की ख़बरों में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखती. और यदि हो भी तो चार पन्नों में क्या क्या समाएगा.

टीवी चैनल जो देखे जाते हैं वो विदेशी हैं या फिर वो हैं जो मनोरंजन के कार्यक्रमों में रूचि लेते हैं.

रेडियो है लेकिन उस पर भी ज़्यादातर सरकार का कब्ज़ा है. लोग यहाँ बीबीसी पर बड़ा भरोसा करते हैं लेकिन वो स्थानीय ख़बरें कितनी प्रसारित कर सकता है.

लॉटरी

अमरीका अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र की बहाली में तो लगा हुआ है लेकिन अभी तय नहीं है कि आने वाले दिनों में इसका स्वरुप क्या होगा.

क़बायली नेता जिन्हें अफ़ग़ानिस्तान में जंगसलार और उनके कमांडर चुनाव मैदान में हैं और यदि वे जीतकर आ जाएँ तो संसद का रुप कैसा होगा यह कोई नहीं जानता.

डॉ सफ़ी कहते हैं कि यदि वे आधे भी आ गए तो अगले पाँच साल तो लड़ाई झगड़े में बीतने वाले हैं.

ब्रशल्स की एक संस्था इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप अफ़ग़ानिस्तान में चुनाव का अध्ययन कर रही है और हाल ही में उसने कहा है कि ये तो एक तरह की लॉटरी है, लोकतंत्र नहीं.

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