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शुक्रवार, 16 सितंबर, 2005 को 15:29 GMT तक के समाचार
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परदे में छिपा चेहरा, गले में अटकी आवाज़

बुरक़े से बाहर झाँकना दुस्साहस की की तरह समझा जाता है
ज़ाबुल दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान का एक प्रांत हैं. सड़क से जाएँ तो राजधानी काबुल से कोई सात घंटे की दूरी पर.

इस प्रांत की तीन सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं. लेकिन वहाँ संसद का चुनाव लड़ने के लिए तीन महिलाएँ भी सामने नहीं आई हैं.

ये वो प्रांत है जहाँ तालेबान का बड़ा दबदबा रहा है और अभी भी उनकी धमकियाँ अभी भी सरकार के आश्वासन से ज़्यादा ताक़तवर होती हैं, भले ही उनकी सत्ता को ख़त्म हुए तीन बरस से ज़्यादा समय बीत गया.

और यह स्थिति सिर्फ़ ज़ाबुल में नहीं है और कई प्रांतों में भी यही संकट है. उदाहरण के लिए नूरिस्तान में एक सीट महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित की गई थी लेकिन वहाँ एक भी महिला चुनाव लड़ने के लिए सामने नहीं आई.

 अभी भी मर्द घर की महिलाओं को बाहर काम करने नहीं जाने देना चाहते क्योंकि जो महिलाएँ काम करने बाहर जाती हैं उनको अच्छा नहीं समझा जाता
अनारकली

यानी स्थिति यह है कि संविधान में संसद की 25 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान तो कर दिया गया है लेकिन स्पष्ट है कि इन सीटों के लिए अभी भी पर्याप्त महिला उम्मीदवार नहीं हैं.

अभी भी कुछ लोग इस आरक्षण का खुला विरोध कर रहे हैं.

उदाहरण के तौर पर संसद का चुनाव लड़ रहे पूर्व क़बायली लड़ाके अहमद शाह अहमदज़ई का कहना है, “महिलाओं को इतना आरक्षण के बारे में लोया जिरगा में कहा गया था कि हर प्रांत में एक महिला सीट आरक्षित रखी जाए. लेकिन जब संविधान घोषित हुआ तो हमें पता चला कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के दबाव में यह कर दिया गया है.”

मुश्किलें

काबुल में स्थिति फिर भी ठीक दिखती है क्योंकि यहाँ क़ानून व्यवस्था की स्थिति बाक़ी प्रांतों की तुलना में बेहतर है क्योंकि यहाँ सरकार का असर पूरा है.

काबुल में पढ़ी-लिखी कुछ महिलाएँ दिखती हैं लेकिन बाक़ी जगह नहीं

मज़ारे शरीफ़ को छोड़कर बाक़ी प्रांतों अभी भी क़बायली लड़ाकों का प्रभाव बना हुआ है.

काबुल में तो महिलाएँ काम करने के लिए बाहर भी आ रही हैं. लेकिन क्या उनकी स्थिति सचमुच बेहतर है?

इस सवाल पर मानवाधिकार आयोग में महिलाओं की स्थिति पर काम कर रहीं अनारकली कहती हैं, “अभी भी मर्द घर की महिलाओं को बाहर काम करने नहीं जाने देना चाहते क्योंकि जो महिलाएँ काम करने बाहर जाती हैं उनको अच्छा नहीं समझा जाता.”

वे स्वीकार करती हैं कि बाहर काम करने जाने के कारण कई लोग उनके बारे में ग़लत धारणाएँ बनाते हैं.

इसका कारण पूछने पर वे कहती हैं, “दरअसल समाज में शिक्षा इतनी कम है कि महिलाएँ ख़ुद अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानतीं.”

अफ़ग़ानिस्तान में बमुश्किल 20 प्रतिशत लोग साक्षर हैं और महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत तो 14 ही है.

अशिक्षा

हिंदू सिख समुदाय के रवींदर सिंह महिलाओं की बदतर स्थिति को अशिक्षा से ही जोड़कर देखते हैं. वे कहते हैं कि जब तक यह स्थिति नहीं सुधरेगी अफ़ग़ानिस्तान में कुछ नहीं बदलने वाला है.

काबुल यूनिवर्सिटी में क़ानून और राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर वादिर सफ़ी कहते हैं कि तत्काल तो वैसे भी कुछ नहीं बदलने वाला है और इसके लिए आने वाले समय का इंतज़ार करना होगा.

अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं पर पाबंदी और अत्याचार की कहानियाँ जगज़ाहिर हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय कोशिश कर रहा है कि राजनीति में उनको लाकर समाज को बदलने की कोशिश की जाए.

भारत में महिलाओं को संसदीय चुनाव में आरक्षण देने के मसले को दो दशकों से जिस तरह टाला जा रहा है उसे देखकर तो लगता है कि रूढ़ीवादी माने जाने वाले अफ़ग़ानिस्तान ने एकबारगी एक लंबी छलाँग तो लगा ही ली है.

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