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बहुत कठिन है अफ़ग़ान चुनाव की डगर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
काबुल में संसदीय चुनाव यानी वोलेसी जिरगा के चुनावों के लिए कुल सीटें हैं 33. और इन 33 सीटों के लिए उम्मीदवारों की संख्या है 390, हर सीट के लिए कोई 12 उम्मीदवार. लेकिन समीकरण इतना सरल नहीं है. हर मतदाता को इन 390 में से अपनी पसंद का एक उम्मीदवार चुनना है. सात पन्नों के मतपत्र में से मतदाता को अपनी पसंद के उम्मीदवार की फ़ोटो पहचाननी होगी या फिर चुनाव चिन्ह ढूँढना होगा. हर पन्ने पर साठ उम्मीदवारों की फ़ोटो होगी. नाम पढ़ने का अवसर कम ही लोगों के पास होगा क्योंकि 80 प्रतिशत से ज़्यादा लोग निरक्षर हैं. बात यहीं ख़त्म नहीं होती. हर मतदाता को तीन मतपत्र दिए जाएँगे और उसे तीनों में अपनी पसंद बतानी होगी यानी 18 सितंबर को हर मतदाता तीन वोट डालेगा. एक मतपत्र तो वोलेसी जिरगा के लिए है ही, दूसरा मतपत्र होगा संसद में अल्पसंख्यक कोची जाति के उम्मीदवार के लिए. इस बंजारा जाति को 249 सीटों वाली संसद में 10 सीटों पर आरक्षण दिया गया है. तीसरा मतपत्र होगा, प्रांतीय परिषद के चुनावों के लिए. इनके लिए भी उम्मीदवारों की भीड़ वैसी ही है जैसी कि संसद के लिए है. और यह पूरा क़िस्सा सिर्फ़ काबुल का नहीं है, पूरे अफ़ग़ानिस्तान का है. संसद की 249 सीटों के लिए 2800 उम्मीदवार हैं तो प्रांतीय परिषद के चुनावों के लिए 3000. काबुल में तो फिर भी चुनावी प्रक्रिया को लेकर थोड़ी बहुत जागरुकता है और जैसा कि जानकार लोग कहते हैं काबुल से बाहर स्थिति बहुत बुरी है. सब निर्दलीय कुछ लोगों को लगता है कि ये संकट इसलिए है क्योंकि चुनाव पार्टी के आधार पर नहीं हो रहे हैं.
हर किसी को कह दिया गया है कि वो स्वतंत्र यानी निर्दलीय चुनाव लड़ें. लिहाज़ा हर उम्मीदवार के पास अपना एक चुनाव चिन्ह है. विश्लेषक मानते हैं कि इससे नुक़सान यह हुआ है कि मुद्दों और कार्यक्रमों की बात कोई नहीं कर रहा है, न किसी का कोई चुनावी घोषणापत्र है. हर कोई अपने व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर चुनाव लड़ने का प्रयास कर रहा है यानी वोट के बदले मतदाता से कोई वादा भी नहीं है. वैसे इस देश में 70 से अधिक राजनीतिक दलों के साथ चुनाव करवाना भी तो कोई आसान काम नहीं रहा होता लेकिन अंतरराष्ट्रीय चुनाव आयोग के नौ अफ़गान सदस्यों में से एक किशन सिंह हुनरयार पार्टी के आधार पर चुनाव न करवाने की अलग की वजह बताते हैं. उन्होंने बीबीसी से कहा, “पार्टी का नाम लेने से ही यहाँ समस्या पैदा हो जाती है क्योंकि लोगों को पार्टियों का अनुभव बुरा रहा है और वे मानते हैं कि बरसों बरस युद्ध पार्टियों के कारण ही होती रहीं.” वे कहते हैं कि पार्टी का नाम लेते ही लोगों को उनसे जुड़ी पुरानी चीज़ें याद आतीं और चुनाव का मक़सद ही ख़त्म हो जाता इसलिए पार्टी का मामला ही हटा दिया. क़बायली नेता निर्दलियों के चुनाव लड़ने से एक बड़ी जटिलता ये पैदा हो गई है कि हर क़बायली नेता जिन्हें अफ़ग़ान जंगसलार कहते हैं, वे ख़ुद चुनाव मैदान में उतर आए हैं और उनके तक़रीबन सभी कमांडर भी.
ये क़बायली नेता काबुल से बाहर के प्रांतों में छत्रप रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे सूबेदार हुआ करते थे. उनके सूबे में उनकी हुकुमत चलती थी. वे सूबेदारों की तुलना में कहीं ज़्यादा अत्याचारी और तानाशाह हुआ करते थे. चुनाव आयोग के सदस्य हुनरयार मानते हैं कि ये क़बायली नेता इन चुनावों के लिए सबसे बड़ी समस्या हैं क्योंकि सरकार की बहुत कोशिशों के बाद भी इनमें से कई के हथियार नहीं डलवाए जा सके हैं. यानी वे हथियार के बल पर जो कुछ कर सकते हैं अभी भी कर रहे हैं, हुनरयार कहते हैं कि यदि वे संसद में आ गए तो अफ़ग़ानिस्तान के निर्माण का रास्ता कठिन होगा. सब जानते हैं कि ये लोग हथियार के बल पर वोट भी पाने की कोशिश करने से नहीं चूकेंगे हालाँकि चुनाव आयोग हथियारबंद गुटों से संबंध के आधार पर पिछले दिनों 11 उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित कर दिया है. विरोध हिंदू सिख समुदाय के प्रतिनिधि रविंदर सिंह इस स्थिति से नाख़ुश दिखते हैं और कहते हैं कि जो वादे किए गए थे वे पूरे नहीं हो रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “क़ानून बनाते समय कहा गया था कि जिसने एक ख़ून भी किया होगा उसे चुनाव नहीं लड़ने देंगे लेकिन अब लाखों ख़ून करने वालों के बारे में ये कह रहे हैं कि वे निर्दोष हैं.” लेकिन चुनाव आयोग का बचाव करते हुए हुनरयार कहते हैं कि संविधान के अनुसार रोका उसे ही जा सकता है जो दोषी है और जिन पर दोष साबित नहीं हुआ है वे सब आयोग के लिए बराबर के हक़दार हैं. हालांकि अफ़ग़ानिस्तान सरकार में मंत्री रह चुके डॉ रमज़ान बशरदोस्त कहते हैं कि यह स्थिति सामान्य है क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान तीस साल युद्ध से ग़ुजरकर आया है और इससे पहले की सरकारों ने जनता के लिए कुछ नहीं किया. बशरयार तो मानते हैं कि यदि क़बायली नेता जीतकर आ भी गए तो कोई चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि संविधान में संसद के किसी भी निर्णय के ख़िलाफ़ सीधे जनता का मत लेने यानी जनमत संग्रह का प्रावधान है. वैसे भी लोकतंत्र के सामने हमेशा बड़े सवाल रहते हैं लेकिन लोकतंत्र की स्थापना के लिए पहली बार चुनाव का सामना कर रहे अफ़ग़ानिस्तान के सामने सवाल ज़्यादा हैं और कुछ ज़्यादा जटिल हैं. और इसमें क्या शक है कि ज़्यादातर सवालों के जवाब आने वाले दिनों में जनता को ही ढूँढ़ने होंगे. |
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