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आडवाणी का पद छोड़ने का फ़ैसला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की समाप्ति पर पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने अपना पद छोड़ने की घोषणा कर दी है. उन्होंने कहा कि भाजपा के दिसंबर में मुंबई में आयोजित होने जा रहे रजत जयंती महाधिवेशन के बाद वो अपना पद छोड़ देंगे. आडवाणी भाजपा के पाँच बार अध्यक्ष रहे हैं. चेन्नई में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की समाप्ति पर दिए अपने भाषण में उन्होंने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) को आड़े हाथों लिया है. आडवाणी ने अपने भाषण का आधे से ज़्यादा हिस्सा आरएसएस पर केंद्रित रखा. उससे ऐसे संकेत साफ़ तौर पर निकलते हैं कि आरएसएस दखलंदाज़ी करता है. माना जा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दबाव के कारण ही आडवाणी ने पद छोड़ने का फ़ैसला किया. आडवाणी ने कहा, “भाजपा के पहले अधिवेशन की अध्यक्षता अटलबिहारी वाजपेयी ने की थी और मैं पार्टी के रजत जयंती अधिवेशन की अध्यक्षता करूंगा. मैंने वैंकया नायडू के व्यक्तिगत कारणों से अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद अध्यक्ष पद स्वीकार किया था. लेकिन मैंने फ़ैसला किया है कि मुंबई अधिवेशन के बाद मैं यह पद छोड़ दूंगा.” आडवाणी ने अपने भाषण में संघ पर तीखे प्रहार किए. उनका कहना था कि भाजपा नेताओं को समय-समय पर संघ के नेताओं से सलाह मशविरा करने में कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन पिछले कुछ समय से ऐसी धारणा बन रही थी कि बिना आरएसएस की सहमति के कोई भी राजनीतिक अथवा संगठनात्मक फ़ैसला नहीं लिया जा सकता है. उन्होंने सलाह दी है कि यह भाजपा और आरएसएस दोनों के लिए अच्छा नहीं है और आरएसएस का राष्ट्र निर्माण जैसा बड़ा लक्ष्य इससे छोटा हो जाता है. उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ और परिवार के अन्य संगठनों से सलाह करके फ़ैसले लेने में भाजपा को मदद मिलती है. लेकिन भाजपा एक राजनीतिक दल है और उसे चुनाव में जाना होता है. लोकतंत्र और बहुदलीय राजनीति में भाजपा को अपनी विचारधारा को बचाते हुए अपने विस्तार के लिए विचारधारा के बाहर के लोगों के साथ भी रिश्ते रखने पड़ते हैं. पद छोड़ने का दबाव दरअसल जिन्ना विवाद के बाद से ही लालकृष्ण आडवाणी पर पार्टी के कुछ नेता निशाना साधते रहे हैं. प्रेक्षकों का मानना है कि आरएसएस के ‘आशीर्वाद’ के बाद ही भाजपा के कुछ नेता लालकृष्ण आडवाणी पर हल्ला बोल रहे थे. कार्यकारिणी की शुरुआत में ही पार्टी के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण ने पार्टी आडवाणी पर हल्ला बोला था. इसके अलावा एक अन्य पूर्व अध्यक्ष जना कृष्णमूर्ति, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा और प्यारेलाल खंडेलवाल जैसे नेता भी आडवाणी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा चुके हैं. दरअसल पाकिस्तान यात्रा के दौरान लालकृष्ण आडवाणी ने मोहम्मद अली जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष कह दिया था और इसके बाद पार्टी के भीतर और संघ परिवार में व्यापक प्रतिक्रिया हुई थी. इसके कारण आडवाणी ने एक बार इस्तीफ़ा भी दे दिया था लेकिन नाटकीय घटनाक्रम के बाद वे इसे वापस लेने को भी राज़ी हो गए थे. लेकिन सूरत में आरएसएस के प्रांत प्रचारकों की बैठक के बाद एक बार फिर आडवाणी को भाजपा अध्यक्ष के पद से हटाने की माँग उठने लगी थी. इसके बाद ख़बरें आईं थीं कि आरएसएस ने आडवाणी को मोहलत दे दी है कि वो अपने इस्तीफ़े का समय ख़ुद ही तय करें. |
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