BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
रविवार, 18 सितंबर, 2005 को 19:39 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
लोकतंत्र का अफ़ग़ानिस्तानी मॉडल

चुनाव में महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी रही
अफ़ग़ानिस्तान में रविवार 18 सितंबर की रात जब उड़ती धूल धीमे-धीमे बैठेगी और रास्तों से ग़ाड़ियों के पहियों के निशान मिटेंगे तब तक देश के इतिहास में एक नया पन्ना जुड़ चुका होगा.

लोकतंत्र का एक नया अध्याय शुरु हो जाएगा फिर वोलेसी जिरगा यानी संसद और प्रांतीय परिषदों के लिए डाले गए वोट चाहें जिसके नाम का भी परचम लेकर निकलें.

चाहे वो पुराने क़बायली नेता हों या फिर साफ़ सुथरी छवि वाले नए लोग जिन्होंने अभी राजनीति का ककहरा भी नहीं सीखा है.

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और छिटपुट हिंसा के बीच मतदान निपट गए हैं और इसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय, ख़ासकर अमरीका को अपनी पीठ थपथपाने का मौक़ा दे दिया है कि उसने अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र की स्थापना कर दी है.

लेकिन तीन दशकों तक युद्ध की विभीषिका झेलते रहे अफ़ग़ानिस्तान को अभी लोकतंत्र में लोक और तंत्र दोनों के बीच तालमेल बनाना सीखना होगा और हो सकता है कि इसमें लंबा समय लगे.

इस वक़्त तो अफ़ग़ानिस्तान के सामने कई बड़े सवाल मुँह बाए खड़े हैं.

क़बायली लड़ाके

उसमें सबसे बड़ा सवाल संसद की उस तस्वीर का है जो आने वाले दिनों में उभरने वाली है.

चुनाव के दौरान जितने मतदाताओं से बात करने का मौक़ा मिला सबने एक सुर से कहा कि उन्हें इस बात से मतलब कुछ ख़ास नहीं है कि कौन जीतकर आ रहा है.

आम जनता बड़ी उम्मीदों के साथ मतदान करने पहुँचे

उनकी चिंता यही है कि कहीं सत्ता उन्हीं लोगों के हाथों में तो नहीं चली जाएगी जिन्होंने देश में युद्ध के बीज बोए थे.

वे साफ़ कह रहे हैं कि संसद में उन्हें आना चाहिए जो जिनकी पृष्ठभूमि साफ़ सुथरी हो.

और यहीं से संकट शुरु होता है क्योंकि संविधान में जो प्रावधान किए गए उसके चलते न चुनाव शिकायत आयोग और न देश का सर्वोच्च न्यायालय उन क़ाबायली नेताओं और उनके कमांडरों को चुनाव लड़ने से रोक पाया जिनके अत्याचारों से कोई भी नावाकिफ़ नहीं है. और अब ये सवाल है कि यदि वे संसद में बहुमत में आ गए तो क्या होगा?

कुछ विश्लेषकों को लगता है कि इससे एक ख़तरा तो रहेगा ही कि क़बायली नेता और उनकी कथित सेना को एक तरह की वैधानिकता मिल जाएगी या वे ऐसा ज़ाहिर तो करेंगे ही कि चूंकि वे चुने हुए प्रतिनिधि हैं उनका जो कुछ भी है सब वैधानिक है.

जनता की अदालत की दलील कोई नई दलील नहीं है.

अधिकारों का मामला

दूसरी बड़ा संकट आने वाले दिनों में यह आने वाला है कि प्रांतीय परिषद और संसद के सदस्य जब चुनकर आएँगे तो उनके पास काम क्या रहेगा.

संविधान इस बारे में चुप है या कि चुप रखा गया है कि प्रांतीय परिषदें किस तरह काम करेंगी या संसद के पास किस तरह के अधिकार रहेंगे.

यानी अभी अफ़ग़ानिस्तान में यह मामला अधर में है कि जनता के प्रतिनिधियों के पास क्या अधिकार होंगे और वास्तव में अपनी जनता के लिए क्या कर पाएँगे.

फ़िलहाल तो संसद और प्रांतीय परिषदों के लिए भवन भी नहीं हैं लेकिन वह कोई संकट नहीं है.

इस समय राष्ट्रपति के पास बहुतेरे अधिकार हैं और जब तक करज़ई राष्ट्रपति हैं तब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह अनुकूल भी लगता है.

सरकार का प्रभाव

मतदान के प्रतिशत के बारे में अधिकारिक घोषणा जब होगी तब होगी लेकिन जिन्होंने पिछले साल अक्तूबर के राष्ट्रपति चुनाव देखे हैं वे बताते हैं कि मतदाता की रुचि मतदान में एकाएक घट गई दिखती है.

यदि ऐसा हुआ है, और इसे राष्ट्रपति करज़ई के एक साल के कामकाज पर प्रतिक्रिया की तरह न भी देखें तो भी सरकार को अपने तईं यह आकलन तो करना ही होगा कि क्या ऐसा घट गया है कि लोग उकताए से दिखते हैं.

फिर कुछ विश्लेषकों को लगता है कि इन चुनावों से सरकार उन इलाक़ों में अपना प्रभाव फैलाने का प्रयास करना चाहती है जहाँ पिछले तीन सालों में वह नहीं कर पाई.

यानी जो काम राष्ट्रपति करज़ई कार्यवाहक राष्ट्रपति रहते हुए नहीं कर पाए और फिर बाक़ायदा वैधानिक रुप से राष्ट्रपति चुने जाने के बाद नहीं कर पाए उसे वे इन चुनावों के ज़रिए करना चाहते हैं.

और ये काम है ज़ाबुल, कांधार जैसे अनेक दक्षिणी प्रांतों में सरकार के प्रभाव के विस्तार का क्योंकि अभी भी माना जाता है कि इन प्रांतों में सरकार की तुलना में अभी भी तालेबान का प्रभाव ज़्यादा है.

इसके अलावा छोटे बड़े कई ऐसे सवाल हैं जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सहायता और देश की आर्थिक स्थिति से जुड़े हैं.

ज़ाहिर है कि उनका सीधा ताल्लुक़ लोकतंत्र से नहीं है लेकिन लोकतंत्र के स्वस्थ्य रहने के लिए जो आर्थिक आत्मनिर्भरता चाहिए वह भी एक बड़ी चुनौती तो है ही.

66अफ़ग़ानिस्तान चुनाव
अफ़ग़ानिस्तान के संसदीय और प्रांतीय चुनाव पर विशेष संकलन.
66काबुल के मतदाता
आइए देखें कि चुनाव से काबुल के मतदाताओं को क्या उम्मीद है.
66गले में अटकी आवाज़
अफ़ग़ान महिलाओं की स्थिति वहाँ गए बिना महसूस नहीं की जा सकती.
66कैसा है अफ़ग़ानिस्तान?
कई अलग-अलग रूप थे विनोद वर्मा के ज़हन में. वहाँ पहुँच कर क्या देखा?
66काबुल में शेक्सपियर
काबुल में पाँच दिनों तक हुए मंचन में महिलाओं ने बिना पर्दे के हिस्सा लिया.
इससे जुड़ी ख़बरें
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>