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मंगलवार, 13 सितंबर, 2005 को 12:52 GMT तक के समाचार
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मेरे सपनों का अफ़ग़ानिस्तान

काबुल
हरियाली का कहीं एक तिनका भी नहीं था
अफ़ग़ानिस्तान आने से पहले कई कई तस्वीरें मन में थीं क्योंकि मन में कई अफ़ग़ानिस्तान थे.

एक वो अफ़ग़ानिस्तान जो बरसों बरस अमरीका और सोवियत संघ जैसी दो महाशक्तियों के बीच शीत युद्ध का बड़ा कारक था या वो जो बुद्ध का अफ़ग़ानिस्तान था.

वो जो लगातार तीन दशकों तक युद्ध की विभीषिका झेलता रहा या वो जो जिसे अब लोकतंत्र के ढाँचे में ढालने में तुला हुआ है. वो अफ़ग़ानिस्तान जहाँ बाबर दफ़्न होना चाहता था (और दफ़्न भी हुआ) या वो जो सिल्क रूट का हिस्सा था.

विमान उतरने से पहले काबुल का जो दृश्य दिखा वो एक और ही अफ़ग़ानिस्तान था.

भूरे-भूरे पहाड़ और उन पर हरियाली का एक तिनका भी नहीं. इतने नंगे पहाड़ मैंने पूरी ज़िंदगी में कहीं नहीं देखे थे.

काबुल जैसा कि ऊँचाई से दिखता है, एक ऐसे वीरान शहर का भ्रम पैदा करता है जिस पर धूल पड़ी हुई है और ज़िंदगी के नाम पर लंबी काली सड़कों पर इक्का दुक्का कारें ही आती जाती दिखती हैं. भूगोल की किताबों में अफ़ग़ानिस्तान के बारे में जो पढ़ा था वह एकबारगी याद आ गया.

फिर ख़याल आया कि इस दुर्गम और निर्जन पहाड़ियों वाले देश को लेकर भी कितनी लड़ाइयाँ लड़ी गईं सिर्फ़ इसलिए कि इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि हर किसी की नज़र इस पर रही.

विमानतल से होटल पहुँचते धीरे-धीरे अफ़गानिस्तान या कहें कि काबुल से परिचय होने लगा.

कौन सा शहर

अनायास ही, जैसा कि किसी नए शहर को देखने के बाद अक्सर होता है, मैं काबुल से उन शहरों की तुलना करने लगा जिन्हें मैंने पहले देखा था. लेकिन एक भी ऐसा शहर याद नहीं आया जो काबुल की तरह दिखता हो. अलबत्ता उजड़े हुए दयारों को देखकर अपने श्रीनगर के वो मकान ज़रुर याद आए जिन्हें चरमपंथियों की बमबारी ने अपना निशाना बनाया था.

अफ़ग़ान बच्चियाँ
बड़ी मुश्किल से तस्वीर ख़िचाने को राज़ी हुई बच्चियाँ

हालांकि अब बहुत कुछ फिर से बनाया जा चुका है और तालेबान सरकार के पतन के बाद से शहर का नक्शा बहुत कुछ बदल गया है लेकिन तबाही के अवशेष नवनिर्माण के प्रतीकों पर अभी भी भारी पड़ते हैं.

सड़कों पर टैक्सियों की संख्या पिछले तीन सालों में दस हज़ार से अधिक बढ़ी है तो काबुल में ही निजी कारों की संख्या में एक लाख से ज़्यादा बढ़ गई है. अमूमन हर कार जापान की बनी एक ही कंपनी की कारें हैं लेकिन हर कार पुरानी है और दुबई से ख़रीदकर लाई हुई सेकेंडहैंड कारें हैं. कुछ नई हैं भी तो उसी कंपनी की.

कारें सड़कों पर उसी तरह चलती हैं जैसी आमतौर पर दिल्ली में चलती हैं, एक दूसरे से सटी हुईं और यहाँ सड़कें ज़्यादा तंग हैं लेकिन हॉर्न का शोर दिल्ली की तुलना में दस गुना कम सुनाई पड़ता है.

नियति और प्रकृति

शहरों में बाज़ार में रौनक बढ़ गई है और हर दिन नई दुकानें खुल रही हैं. काबुल के हबीबिया हाईस्कूल का भवन फिर से बना दिया गया है और सड़कें भी दुरुस्त की गई हैं. सबसे बड़ी क्रांति दिखती है कि जगह जगह इंटरनेट कैफ़े खुल गए हैं और लोग अपने आपको दुनिया से जोड़कर देख पा रहे हैं.

महिलाएँ काबुल शहर के भीतर भी अभी भी बुर्क़े में हैं. लेकिन दुकानों के शो केस में जिस तरह के कपड़े दिखाई पड़ते हैं उसे देखकर आश्चर्य होता है कि इन्हें पहनता कौन है यहाँ, मैंने यह सवाल अपने दुभाषिए से पूछा तो उसने मुस्कुरा कर कहा, सब लोग. पता नहीं वह व्यंग्य कर रहा था या सच कह रहा था.

तालेबान सरकार के पतन के तीन बरस बाद भी पर्दे से बाहर आने की झिझक अभी बाक़ी है. काबुल में तो फिर भी कुछ महिलाएँ निकल रही हैं लेकिन बाहर बताते हैं कि अभी भी वैसी ही स्थिति है.

काबुल से 50 किलोमीटर दूर एक गाँव में तीन छोटी बच्चियों की तस्वीर खींचने के लिए मुझे डेढ़ घंटे इंतज़ार करना पड़ा और तस्वीर भी तब खींची जा सकी जब उनके दादा जी ने घुड़ककर कहा कि वे फ़ोटो खिंचवा लें. दादा भी उतनी देर हमें भाँपते रहे.

नियती और प्रकृति भी कैसे कैसे खेल खेलती है.

जिस धरती को कुछ नहीं दिया उस धरती में तराशे हुए चेहरों और आकर्षक हँसी वाले लोग दिए.

उनको दुनियावी रुप से भले ही कुछ नहीं दिया लेकिन दिल दरिया की तरह दिए.

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