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फ़िल्म ने बच्ची को बचाया | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह सितंबर 2002 की बात है जब ज़मज़मा को कुछ भरोसा हुआ कि वह अपना बचपन हँसी-ख़ुशी गुज़ार कर अपनी लंबी उम्र के लिए योजनाएँ बना सकती है. यह अनाथ अफ़ग़ान बच्ची ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी लेकिन बीबीसी की एक फ़िल्म देख कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान उसकी ओर गया. यह फ़िल्म एक अफ़ग़ान महिला सीमा ग़नी के जीवन पर बनाई गई थी जिन्होंने लंदन में अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़ कर लोगों का दुख दर्द बाँटने को तरजीह दी. सीमा विशेष रूप से अफ़ग़ानिस्तान के अनाथ बच्चों के लिए काम करने में दिलचस्पी रखती थीं. बीबीसी का कैमरा उनके साथ एक अनाथालय गया जहाँ की एक नौ वर्षीय बच्ची ज़मज़मा भी फ़िल्म का हिस्सा बन गई.
इस बच्ची को इतना गंभीर ह्रदय रोग था कि अगले दो वर्ष में ऑपरेशन न होने की स्थिति में उसकी मौत भी हो सकती थी. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में इतना जटिल ऑपरेशन होना मुमकिन नहीं था और कोई वैकल्पिक व्यवस्था करना भी आसान नहीं था. बीबीसी पर प्रसारित इस रिपोर्ट को मद्रास मेडिकल मिशन के जाने-माने ह्रदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के एम चेरियन ने देखा. यह कहानी उनके मन को छू गई और उन्होंने तय किया कि वह इस बच्ची की मदद करेंगे. उनका कहना है, "मुझे लगा इस बच्ची के लिए कुछ करना चाहिए. न केवल निजी रूप से बल्कि अफ़ग़ान वासियों के प्रति अपनी एकजुटता दिखाने के लिए भी."
ज़मज़मा ऑपरेशन थियेटर में ले जाई गई और और फिर दो घंटे की मेहनत के बाद उसकी समस्या का हल निकाल लिया गया. ज़मज़मा अब पूरी तरह स्वस्थ है और एक सामान्य जीवन बिता सकती है. वह कहती हैं, "हम सचमुच सौभाग्यशाली थे. इतने लोगों ने मदद की और एक ज़िंदगी बचा ली." सीमा को इस बात का अफ़सोस था कि वैसे इतने बच्चे ऐसे भी हैं जिनकी तरफ़ किसी का ध्यान ही नहीं जाता और पैसे की कमी से उनका इलाज नही हो पाता. |
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