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शुक्रवार, 09 सितंबर, 2005 को 11:50 GMT तक के समाचार
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समाजिक न्याय का मसला फिर वैचारिक चौहारे पर

विरोध प्रदर्शन
मंडल आयोग की सिफ़ारिशें 1990 में लागू करने की घोषणा हुई तो इसका व्यापक विरोध हुआ था
भारत में मंडल आयोग की रिपोर्ट और उसे लागू करने के तत्कालीन राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के ऐलान को लेकर सब 1990 में जितने कड़वे विवाद उठे, उतनी सुसंगत बहस नहीं हुई.

शायद इसलिए कि विवाद के उत्प्रेरकों को विवेक और विचार से ज़्यादा बल और दबंगई पर भरोसा था. लेकिन उस परिघटना के लगभग डेढ़ दशक बाद आज यह बात आईने के तरह साफ़ है कि ‘मंडल’ से राजनीति में नई तरह के समीकरण उभरे और सामाजिक ध्रुवीकरण का नया स्वरूप सामने आया.

इसने सत्ता-राजनीति और सत्ता-प्रतिष्ठान के वर्षों से चले आ रहे आंतरिक स्वरूप और संरचना को झकझोर कर दिया. मुख्यधारा की बड़ी राजनीतिक पार्टियों में ‘मंडल’ से पहले पिछड़े वर्ग के नेताओं की हैसियत दोयम दर्जे की थी लेकिन ‘मंडल’ ने यकायक पिछड़े वर्ग और उनके नेताओं को महत्वपूर्ण बना दिया.

रुपांतरण

आरक्षण के औचित्य-अनौचित्य पर तब भी बहस थी, आज भी है और शायद आगे रहेगी. असमान विकास, क्षेत्रीय-विषमता और वर्ग-वर्ण भेद-ग्रस्त भारतीय समाज में इस तरह की बहस लाजिमी है. पर तथ्यों की रोशनी में देखें तो पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण या उससे पहले दलितों के आरक्षण से हमारे समाज, शासन और राजनीति में काफी कुछ रूपांतरित हुआ.

समाज के निचले तबकों की सत्ता-संरचना में न केवल भागीदारी बढ़ी अपितु उनमें आत्मविश्वास भी आया. एक राष्ट्र के रूप में हमारी प्रगति और विकास का असंतुलन भी पहले के मुकाबले नियंत्रित हुआ.

इस घटना ने साबित किया कि आजादी से पहले सन 1932 में पूना-पैक्ट की बहस के दौरान डॉ आम्बेडकर ने कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष जो तर्क दिए, वे सौ फीसदी सही थे.

आज़ादी मिलने के कई दशकों तक सरकार, प्रशासन और सामाजिक-आर्थिक जीवन के अन्य क्षेत्रों में दलितों-पिछड़ों की हिस्सेदारी नगण्य थी लेकिन आरक्षण का प्रावधान जैसे-जैसे प्रभावी होता गया, इन समुदायों की भागीदारी भी बढ़ती गई.

निजी क्षेत्र

सिर्फ़ योग्यता या पढ़ने-लिखने की कथित सुविधा देने मात्र से यह संभव नहीं था क्योंकि वर्ग और वर्णभेदग्रस्त समाज में नियोक्ता की पक्षधरतापूर्ण मानसिकता आसानी से नहीं बदलती.

 निजी क्षेत्र की ऊँची प्रबंधकीय-नौकरियों या जन संचार और मीडिया जैसे ‘प्रगतिशील क्षेत्र’ में आज भी समाज के एक ख़ास हिस्से का संपूर्ण वर्चस्व है. जबकि सेना-फ़ौज, पुलिस और अन्य साधारण सरकारी नौकरियों में दलितों-पिछड़ों की भारी संख्या है

इसकी पुष्टि उन क्षेत्रों की नियुक्तियों से की जा सकती है, जहाँ आज भी आरक्षण के प्रावधान नहीं लागू हैं. ऐसे क्षेत्रों में दलित-पिछड़ों की हिस्सेदारी आज भी बहुत कम है.

उदाहरण के लिए निजी क्षेत्र की ऊँची प्रबंधकीय-नौकरियों या जन संचार और मीडिया जैसे ‘प्रगतिशील क्षेत्र’ में आज भी समाज के एक ख़ास हिस्से का संपूर्ण वर्चस्व है. जबकि सेना-फ़ौज, पुलिस और अन्य साधारण सरकारी नौकरियों में दलितों-पिछड़ों की भारी संख्या है.

आरक्षण जैसे ‘असमान अवसर के प्रावधान’ का फायदा उठाकर राज्य और केंद्रीय प्रशासनिक सेवाओं में इन वर्गों के सदस्य जा रहे हैं. जन-समर्थन के बल पर राजनीति में भी उनकी संख्या और हैसियत बढ़ी है.

यहाँ तक कि एक दलित को देश का राष्ट्रपति बनने का भी अवसर मिला. लेकिन अचरज की बात है कि अब तक दलित समुदायों से एक भी व्यक्ति किसी प्रमुख कारपोरेट हाउस या निजी उपक्रम में शीर्ष पद पर नहीं पहुँचा.

समाज में विचार और मूल्यों को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले जनसंचार या मीडिया के क्षेत्र में भी अब तक कोई दलित वरिष्ठ पत्रकार या संपादक नहीं बना. ये ‘अनारक्षित क्षेत्र’ दलित-पिछड़ों के लिए अब भी अभेद्य दुर्ग बने हुए हैं.

देश के नीजी क्षेत्र में दलित-पिछड़ों के आरक्षण के लिए इधर नई बहस छिड़ी है. केंद्र की सत्ता संभाल रहे गठबंधन ने अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में निजी क्षेत्र में आरक्षण की वकालत की है. लेकिन फिलहाल इस पर किसी भी तरफ से कोई ठोस पहल नहीं हुई है.

‘मंडल’ के पुराने पड़ चुके ‘मसीहा’ भी कुछ ज़्यादा नहीं कर पा रहे हैं, जबकि विनिवेश और निजीकरण के मौजूदा दौर में आरक्षण-प्रावधानों का दायरा निजी क्षेत्र तक नहीं बढ़ाया गया तो अगले कुछ दशकों में दलित-पिछड़ों की विभिन्न सेवाओं में हिस्सेदारी और सामाजिक-आर्थिक प्रगति बुरी तरह प्रभावित होगी.

बड़ा सवाल

मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने के अपने फ़ैसले का महत्व रेखांकित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 9 अगस्त 1990 को राज्यसभा में एक बड़ा सच उदघाटित किया था "यह सिर्फ़ नौकरी देने और रोज़गार के अवसर बढ़ाने का ही माध्यम नहीं और न ही मात्र आर्थिक अवस्था सुधारने का सवाल है. सवाल है पूरी मशीनरी के निर्णय लेने, प्रशासन में भागीदारी पाने अथवा देश का भाग्य संवारने में समाज के उन वर्गों को न्यायोचित हिस्सा देने का, जो मौज़ूदा सामाजिक ढाँचे के कारण अब तक इससे वंचित रहे हैं."

वीपी सिंह
वीपी सिंह सामाजिक ढाँचे में बदलाव की बात कर रहे थे

लेकिन मंडल रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति और अन्य हलकों में जो कुछ हुआ, वह अब इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है. ‘मंडल’ के बाद ‘ मंदिर’ का मुद्दा तेज़ी से उछाला गया और सांप्रदायिकता को सत्ता की नई विचारधारा बनाने की कोशिश की गई.

उत्तर के कई हिंदी भाषी राज्यों में कांग्रेस की जगह कैसे ‘जनसंघ’ के नए अवतार भाजपा ने ली और आरक्षण विरोधियों को कैसे मंदिर-मस्जिद विवाद में अपनी नई राजनीति की ज़मीन मिल गई, अध्ययन का यह अलग पहलू है.

लेकिन यह रेखांकित करना यहाँ ज़रूरी है कि पिछड़ों के आरक्षण के ख़िलाफ़ उत्तर भारत के सवर्ण समुदायों के प्रभावी हिस्से की प्रतिक्रियावादी बौखलाहट का ही इस्तेमाल कर भाजना ने इन इलाकों में अपना जनाधार बनाया.

बाद में उसमें ‘सामाजिक-अभियांत्रिकी’ या सोशल इंजीनियरिंग की चाशनी भी डाली गई. इस पूरी प्रक्रिया में कांग्रेस तमाशबीन रही. नेतृत्व में ‘सवर्ण-वर्चस्व’ के चलते वह न तो पिछड़ों के साथ खड़ी हो सकी और न ही संविधान की भावना और ‘समाजवाद’ के अपने घोषित उसूलों से बंधे होने की मज़बूरी के चलते वह भाजपा की तरह ‘सवर्ण हिंदुओं की उग्रता’ को अपना समर्थन दे सकी.

इस दौर में वह सिर्फ़ दक्षिण के कुछ राज्यों और हिंदी क्षेत्र के राजनीतिक रूप से अपेक्षाकृत कम जागरुक राज्यों मध्यप्रदेश और राजस्थान में ही अपने को बचा सकी. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे दो बड़े सूबों में उसका लगभग सफाया हो गया.

कांग्रेस के लिए यह बड़ा आघात था, आज तक वह इससे उबर नहीं सकी है. देश की एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में वह अब भी सामाजिक रूपांतरण के बड़े मुद्दों पर वैचारिक असमंजस का शिकार है.

आगे का रास्ता

इधर ‘मंडल’ के लगभग डेढ़ दशक बाद उत्तर भारत की राजनीति और सामाजिक गोलबंदी एक बार फिर वैचारिक चौराहे पर खड़ी है. उसे अपना अगला रास्ता तय करना है.

मंडल रिपोर्ट से उठे बवंडर में ‘सामाजिक न्याय’ के ‘बड़े दूत’ बनकर उभरे दलित-पिछड़ों के अधिसंख्य नेता अपनी राजनैतिक-वैचारिक चमक खो चुके हैं. सत्ता में आने के बाद उनके ‘शब्द’ और ‘कर्म’ में गहरी खाई सामने आई.

 सामाजिक न्याय-अभियान को आगे बढ़ाने के उनके नारे ‘खाली कारतूस’ साबित हुए. कईयों पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के गंभीर आरोप लगे. कइयों की शासकीय दृष्टिहीनता ने उनका करिश्मा ख़त्म कर दिया और विचारवान माने गए कुछेक मंडलवादी नेता सामाजिक न्याय का सुदृढ़ीकरण करने की बजाय भाजपा की ‘रामनामी गोद’ में जा बैठे

सामाजिक न्याय-अभियान को आगे बढ़ाने के उनके नारे ‘खाली कारतूस’ साबित हुए. कईयों पर भ्रष्टाचार और परिवारवाद के गंभीर आरोप लगे. कइयों की शासकीय दृष्टिहीनता ने उनका करिश्मा ख़त्म कर दिया और विचारवान माने गए कुछेक मंडलवादी नेता सामाजिक न्याय का सुदृढ़ीकरण करने की बजाय भाजपा की ‘रामनामी गोद’ में जा बैठे.

पर इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि दलित या पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधियों की यही नियति है या कि सिर्फ़ सवर्ण-संभ्रांत समाज के प्रतिनिधि ही देश को सही दिशा दे सकते हैं.

सामाजिक न्याय के इन स्वघोषित दूतों के वैचारिक-स्खलन से सिर्फ़ एक बात साफ हुई है कि भारतीय समाज में सामाजिक की विचारधारात्मक लड़ाई के लिए ज़्यादा सुसंगत-सुदृढ़ प्रतिनिधियों की जरूरत है.

कई तरह की शक्तियाँ इस दिशा में सक्रिए हैं. कुछ सत्ता राजनीति का हिस्सा हैं तो कुछ ‘बदलाव की राजनीति’ को अपना एजेंडा मानती हैं. बेहतर विकल्प की तलाश करते भारतीय समाज को आर्थिक-प्रगति, सामाजिक न्याय और सुसंगत विकास का रास्ता कौन दिखाएगा इस बारे में भविष्यवाणी करना कठिन है.

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