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राजनीति बदली लेकिन समाज तक असर नहीं | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसमें कोई शक नहीं कि मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने का फ़ैसला मुख्य रुप एक राजनीतिक घोषणा थी. आज हम पूरे ऐतिहासिक परिदृश्य को सामने रख करके कह सकते हैं कि उसमें सामाजिक बाध्यताएँ रही होंगी. लेकिन इसमें भी कई सवाल थे. मंडल की रपट तो 1980 में आ गई थीं. सवाल यह है कि ऐसी कौन सी सामाजिक बाध्यताएँ थीं जो 1980 से 1989 तक नहीं रहीं और अचानक 1990 में पैदा हो गईं. सत्ता में हमेशा सामाजिक बाध्यता केवल बाहरी सीमाओं को तय करती है, सामाजिक बाध्यता यह तय नहीं करती कि कौन सा क़दम किस दिन उठाना है. इस लिहाज से मंडल आयोग को लागू करने का निर्णय एक राजनीतिक निर्णय था जिस तरह बाक़ी बड़े निर्णय होते हैं. जैसे रोज़गार गारंटी, सूचना के अधिकार जैसे क़ानून को पाँच या दस वर्ष टाला जा सकता है और इसे एक राजनीतिक, दूरगामी और सूझबूझ के नमूने के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन निश्चित ही ये राजनीतिक निर्णय सामाजिक बाध्यताओं से बंधा हुआ नहीं हो तब भी वो समाज पर गहरा असर डाल सकता है और मंडल आयोग की रपट को लागू करने का निर्णय उसका एक उदाहरण है. लेकिन जो सामाजिक परिर्वतन है उसे भी दो हिस्से में बांट कर देखा जाना चाहिए. एक तो वो जो कि समाज में राजनीतिक सत्ता के समीकरणों को प्रभावित करते हैं और दूसरे वो जो कि समाज में दैनंदिन व्यवहार को प्रभावित करते हैं. राजनीतिक सत्ता के समीकरण मंडल आयोग के जो असली असर हुए हैं वह पहली क़िस्म के हुए हैं और दूसरे क़िस्म के असर कम हुए हैं और कुछ ख़ास इलाकों में ही हुए हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि मंडल आयोग को लागू करने का निर्णय वह अवसर बना. शायद वह कारण नहीं था लेकिन वह एक अवसर बन गया. जब उत्तर भारत में जातिगत सत्ता का समीकरण परिवर्तित होने का एक जो दौर था वह मंडल की घोषणा के साथ शुरू हो गया. यह परिवर्तन बहुत समय से रूका हुआ था.
दक्षिण भारत में ये 60 के दशक में पूरा हो चुका था और 70 का दशक शुरू होते होते-होते यह परिवर्तन कर्नाटक तक आ चुका था. यह परिवर्तन उत्तर भारत में रूका हुआ था वह बहुत ही कृत्रिम तरीके से रूका हुआ था. मंडल आयोग को लागू करने के निर्णय और उसके बाद उसके विरुद्ध जो आंदोलन हुआ उसने इसे एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया. इस आंदोलन ने पिछड़ेपन और पिछड़ी जाति नामक एक चीज़ को एक राष्ट्रीय पहचान बना दिया. उस लिहाज से मंडल आयोग को लागू करने के निर्णय से राजसत्ता का जो समीकरण था कि कौन सत्ता पर काबिज़ होगा, कौन जातियाँ ऊपर जाएँगी, किस जाति के लोग राजनीतिक सत्ता हासिल करेंगे, सरपंच मुखिया बनेंगे, विधायक-सांसद बनेंगे, इस पर बहुत ही बुनियादी असर पर पड़ा है. ख़ासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में तस्वीर बिल्कुल बदल गई. यहाँ हम पुराने बिहार की बात कर रहे हैं जिसमें झारखंड शामिल है, उत्तरांचल उस हद तक भले ही शामिल नहीं है. काफ़ी हद तक मध्यप्रदेश का चेहरा भी बदला है और कहीं न कहीं राजस्थान पर भी असर पड़ना शुरू हुआ है. दैनंदिन परिवर्तन यह तो बहुत ही दूरगामी परिवर्तन हुआ. रही बात दैनंदिन सामाजिक परिवर्तन की तो उसमें बहुत सीमित बदलाव आए हैं. बाक़ी जगह की अपेक्षा उत्तर प्रदेश में ज़्यादा बदलाव आए हैं. वहाँ बदलाव आने की वजह यह थी कि संयोगवश मंडल आयोग के लागू होने का वही वक़्त था जबकि दलित चेतना का भी उभार भी हो रहा था.
वह सीधे-सीधे मंडला आयोग के लागू होने का परिणाम नहीं था, लेकिन चूंकि दो चीज़ें एक साथ हुईं इसलिए उत्तर प्रदेश में कई मायने में महसूस होता है कि परिवर्तन हुआ. दैनंदिन जीवन का जो एक समीकरण होता है कि कौन किसको सलाम करेगा, कौन घोड़ी पर चढ़कर बारात जाएगा तो यह सब चीज़े उत्तर प्रदेश में कई हद तक बदली हैं. लेकिन जिस चीज़ पर मंडल आयोग की रिपोर्ट का कोई असर नहीं पड़ा, और विडंबना यह है कि उस बारे में मंडल आयोग की रिपोर्ट में विस्तार से लिखा था, वह है आर्थिक सत्ता का समीकरण. मंडल आयोग की रिपोर्ट बहुत विस्तार से प्रकाश डालती है कि किस तरह से ज़मीन और संपत्ति का जो असमान बँटवारा है अलग-अलग जातियों में, वह एक बहुत बड़ा सवाल है. मंडल आयोग की रिपोर्ट में महत्वपूर्ण सुझाव जो थे वह भूमि सुधार के बारे में थे, उसको लागू नहीं किया गया. मंडल आयोग की तमाम अनुशंसाओं में से केवल एक लागू किया गया. और ज़ाहिर है उस सबका कोई असर नहीं हुआ यानी कि लोगों की जो संपत्ति, रोज़गार, गरीबी और पिछड़ों की जो आर्थिक स्थिति है उस पर कोई बुनियादी असर होता दिखाई नहीं देता. सकारात्मक-नाकारात्मक सत्ता में पिछले पचास सालों से ही नहीं कई मायनों सैंकड़ों साल से जो लोग क़ाबिज थे वे लोग बदलें दूसरे लोग आएं, ये राजनीतिक में हमेशा सार्थक साबित होता है. सत्ता पलट और शीर्ष पर एक तरह का बदलाव, ये राजनीति में एक स्वस्थ्य परिवर्तन लाता है. समाज में घुटन कम होती है और कुंठाएँ कम होती हैं. इसमें कोई शक नहीं कि ऐसा परिवर्तन हमेशा एक संघर्ष के साथ आता है. इस परिवर्तन से एक तनाव भी होता है. लेकिन मैं इस तनाव को मैं बहुत महत्व नहीं देता. हमें उन सब तनावों को भी ध्यान में रखना चाहिए जो एक वर्ग विशेष के समाज और सत्ता पर सैकड़ों वर्ष काबिज़ रहने से पैदा होता है. इन मायनों में तो इस तनाव को सकारात्मक मानना चाहिए. जो नकारात्मक पहलू दिखाई देता है उसके लिए मंडल आयोग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन जिस ऐतिहासिक संदर्भ में मंडल आयोग लागू हुआ उसके चलते पिछड़े के हाथों में सत्ता के कुछ टुकड़े तो आ गए लेकिन वह सामाजिक परिवर्तन से जुड़ नहीं पाया. दक्षिण भारत में जब यह परिवर्तन आया तो इसके दूसरे तरह के परिवर्तन हुए. ये मध्यान्ह भोजन आदि जो है वह अगड़ों से पिछड़ों की तरफ़ सत्ता परिवर्तन का संकेत था. तो दक्षिण भारत में जो जातिगत सत्ता का जो परिवर्तन था वह बड़े सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी बदलाव का कारण बना. लेकिन उत्तर भारत में यह परिवर्तन बहुत सीमित, संकुचित और एक मायने में प्रतिगामी क़िस्म का रहा. यह बहुत हद तक मुख्यमंत्री, सांसद और विधायक की कुर्सी हासिल करने तक सीमित रहा. और इसके साथ कोई बुनियादी परिवर्तन का एजेंडा नहीं जुड़ पाया. इससे हुआ यह कि बिहार में मंडल के बाद का दशक नकारात्मक विकास का दशक बना. उत्तर प्रदेश में पिछड़ों के उभार का यह दशक कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों के हाथों में पूरे प्रदेश को सौंप देने का समय बनता है. ये गहरी नाकारात्मक प्रवृत्तियाँ हैं जिसके लिए मंडल आयोग ज़िम्मेवार नहीं है लेकिन ये उसके साथ जुडी हुई है. लोग कहते हैं कि मंडल के आने के बाद से जातिवाद और सांप्रदायिकता बढ़ गई है. लेकिन यह स्वीकार करने योग्य नहीं है. पहले इसकी चर्चा सार्वजनिक रुप से नहीं होती थी. तनाव समाज में सदैव था भले ही सामने ने दिखाई पड़ता रहा हो. असली नकारात्मक चीज़ यह है कि ये परिवर्तन अपनी संभावनाओं को पूरी तरह से पूरा नहीं कर पाया. |
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