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सोमवार, 22 अगस्त, 2005 को 16:10 GMT तक के समाचार
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इक्कीसवीं सदी में पाषाण युद्ध

पाषाण युद्ध
पाषाण युद्ध की परंपरा इक्कीसवीं सदी में भी बरक़रार है
दुनिया में जब इंसानी ज़िंदगी शुरू हुई तो इंसान के हाथ में एक पत्थर था. पेट भरने और अस्तित्व को बनाए रखने के संघर्ष के दरम्यान इंसान ने उस पत्थर को हथियार बनाया और जल्द ही औज़ार भी.

आदमी और पत्थर की ये दोस्ती सभ्यताओं के विभिन्न दौर से गुजरती हुई इक्कीसवीं सदी के इस मशीनी युग में भी क़ायम रह सकती है- इस बात पर यकीन नहीं आता.

लेकिन भारत के पहाड़ी राज्य उत्तरांचल के चंपावत ज़िले के देवीधुरा कस्बे में आज भी आदिम सभ्यता जीवंत हो उठती है जब लोग ‘पाषाण युद्ध’ का उत्सव मनाते हैं.

एक-दूसरे पर निशाना साधकर पत्थर बरसाती वीरों की टोली, इन वीरों की जयकार और वीर रस के गीतों से गूंजता वातावरण, हवा में तैर रहे पत्थर ही पत्थर और उनकी मार से बचने के लिये हाथों में बांस के फर्रे लिये युद्ध करते वीर.

 सब चाहते हैं कि उनकी टोली जीते लेकिन साथ ही जिसका जितना खून बहता है वो उतना ही ख़ुशक़िस्मत भी समझा जाता है. इसका मतलब है कि देवी ने उसकी पूजा स्वीकार कर ली."
गंगा सिंह बिष्ट

आस-पास के पेड़ों, पहाड़ों औऱ घर की छतों से हजारों लोग सांस रोके पाषाण युद्ध के इस रोमांचकारी दृश्य को देख रहे हैं.

सिलसिला थमता नहीं

कभी कोई पत्थर की चोट से घायल हो जाता है तो फौरन उसे पास ही बने डॉक्टरी कैंप में ले जाया जाता है. युद्धभूमि में खून बहने लगता है, पत्थर की बौछार थोड़ी देर के लिये धीमी जरूर हो जाती है लेकिन ये सिलसिला थमता नहीं.

हर साल हजारों लोग दूर-दूर से इस उत्सव में शामिल होने आते हैं.

आस-पास के गांवों में हफ़्तों पहले से इसमें भाग लेने के लिये वीरों और उनके मुखिया का चुनाव शुरू हो जाता है.

अपने-अपने पत्थर और बांस की ढालें तैयार कर लोग इसकी बाट जोहने लगते हैं.

चमियाल टोली के मुखिया गंगा सिंह बिष्ट कहते हैं,"सब चाहते हैं कि उनकी टोली जीते लेकिन साथ ही जिसका जितना खून बहता है वो उतना ही ख़ुशक़िस्मत भी समझा जाता है. इसका मतलब है कि देवी ने उसकी पूजा स्वीकार कर ली."

बग्वाल यानी पाषाण युद्ध की ये परंपरा हजारों साल से देवीधूरा में चली आ रही है. मान्यता है कि बाराही देवी को मनाने के लिए ही ये खेल किया जाता है.

 पहले यहाँ आदमी की बलि दी जाती थी. लेकिन जब एक वृद्धा के इकलौते पोते की बारी आई तो उसने उसे बचाने के लिये देवी से प्रार्थना की. देवी उसकी आराधना से खुश हुई और उसके पोते को जीवनदान दिया लेकिन साथ ही शर्त रखी कि एक व्यक्ति के बराबर ख़ून उसे चढ़ाया जाए. तभी से पाषाण युद्ध में खून बहाकर देवी को प्रसन्न किया जाता है."
पुजारी जयदत्त

किंवदंती

मंदिर के पुजारी जयदत्त इसके महत्त्व के बारे में बताते हैं, "पहले यहाँ आदमी की बलि दी जाती थी. लेकिन जब एक वृद्धा के इकलौते पोते की बारी आई तो उसने उसे बचाने के लिये देवी से प्रार्थना की. देवी उसकी आराधना से खुश हुई और उसके पोते को जीवनदान दिया लेकिन साथ ही शर्त रखी कि एक व्यक्ति के बराबर ख़ून उसे चढ़ाया जाए. तभी से पाषाण युद्ध में खून बहाकर देवी को प्रसन्न किया जाता है."

आज भी जब पुजारी संतुष्ट हो जाता है कि एक व्यक्ति के बराबर ख़ून बह गया तभी बग्वाल का समापन होता है.

चंपावत के विधायक हेमेश खर्कवाल कहते हैं," ये एक तरह से ख़ूनी संघर्ष ही होता है लेकिन आजतक इसमें किसी को जानलेवा चोटें नहीं आईं और न ही कभी कोई अप्रिय घटना घटी."

पुजारी के शँखनाद के साथ ही जैसे ही इस युद्ध का समापन होता है सभी टोलियों के लोग एक-दूसरे से गले मिलकर खुशी मनाते हैं और घायलों की कुशलक्षेम पूछते हैं.

सैलानियों के बीच भी बग्वाल का आकर्षण बढ़ता जा रहा है.दिल्ली,मुंबई,हरियाणा,पंजाब के साथ-साथ बड़ी संख्या में विदेशी भी इस अनोखे युद्ध को देखने इस समय यहां आते हैं.

यूरोप से आईं कैथलीन कहती हैं," पत्थरों की इस तूफ़ानी बरसात से डर भी लगता है लेकिन सबसे ज्यादा कौतूहल की बात ये है कि लोगों को चोट आती है, गिरते हैं लेकिन फिर इस खेल में शामिल हो जाते हैं".

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