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अर्ज़ी लगाते हैं लोग देवता के पास | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हल्द्वानी से नैनीताल जाने वाली पहाड़ी सड़क के किनारे कभी चट्टानों पर और कभी-कभी छोटे-छोटे टिन के साइन बोर्ड पर गोलू देवता का नाम बार-बार नज़र आया. इतने आत्मीय ढंग से पुकारे जाने वाले इन आराध्य देव के बारे में ज़ाहिर है जिज्ञासा और बढ़ी. पूछने पर मालूम हुआ कि ये एक ऐसे देवता हैं जिनके यहाँ एक क़िस्म का पूरा कार्यालय चल रहा है- दरख़्वास्त, अर्ज़ी, स्टैम्प पेपर वगैरा-वगैरा. बात इतनी दिलचस्प थी कि दूसरे दिन ही नैनीताल से आधे घंटे का सफर तय कर हम पहुँच गए घोड़ाखाल. बताशे, नारियल, अगरबत्तियाँ, छोटी-छोटी लाल चुनरियाँ और देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बेच रहे दुकानें. एक 10-12 साल का बालक ''प्रसाद-प्रसाद ले लो भई प्रसाद" के नारे लगा रहा है. एक दुकानदार और ग्राहक के बीच '11 रुपए वाले प्रसाद' या '21 रुपए की थाल' पर झिकझिक चल रही है. मान्यता देखते ही समझ में आ गया कि हम मंदिर पहुँच गए हैं. पहाड़ी पर बसे इस श्रद्धास्थल में पहुँचने के लिए हमें ऊँची-ऊँची लगभग 25-30 सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं. किसी समय शायद यह कच्ची रही हो, लेकिन अब सीमेंट के इस्तेमाल से पक्की कर दी गई हैं. लेकिन मंदिर तक पहुंचने में फिर भी सांस फूल गई. थोड़ा ध्यान तो मंदिर से आ रही घंटों की आवाज़ से बँट गया था. कुछ मैंने अपने गाइड और स्थानीय मित्र महेश पांडेय से बात करके लगा लिया-''इस मंदिर की इतनी मान्यता क्यों है?'' ''इस मंदिर की कुमाऊँ में न्याय देवता के मंदिर के रूप में मान्यता है. जिसे कहीं कोई न्याय नहीं मिलता और जो नाउम्मीद हो चुका होता है, न्यायालय से, विभागों से, सरकारी तंत्र से वह यहाँ आकर न्याय की गुहार करता है. लोगों का विश्वास है कि यह देवता उन्हें न्याय देता है.'' पांडेयजी ने धौंकनी की तरह चल रही सांसों के बीच रुक-रुक कर कहा. लिखित अर्ज़ी और दरख़्वास्त की बात जो हमारे गाईड ने कही थी वह गलत नहीं थी. ऊपर मुख्य मंदिर के दाहिने बाजू पर- बड़ी-बड़ी मूँछे, पगड़ी और खड्ग धारण किए हुए घोड़े पर विराजमान गोलू देवता की प्रतिमा के समक्ष पचासियों प्रार्थना पत्र रखे हैं. कुछ कीलों पर और खूँटियों से लटके हैं. हवा से फड़फड़ाते हुए. मानों देवता को बार-बार अपनी अर्ज़ी की याद दिला रहे हों. ऐसे ही एक दरख़्वास्त पर हमारी नज़र पड़ी. किसी महिला की हैंड राइटिंग है, प्रेम विरह को दूर कर प्रणय सूत्र में बंधने के लिए, - "हे गोलू देवता मेरी शादी इसी से करवाना. मैं आपको रोज़ याद करती हूँ. अगर मेरे ग्रह शादी में रूकावट बना रहे हों तो उसे शांत कर देना" और एक साहब ने तो अपनी अर्ज़ी बाक़ायदा स्टैम्प पेपर पर लिखकर गोलू देवता को पेश की है. 10 रूपए के स्टैम्प पेपर पर लिखा है कि मुक़दमे के बाद समझौता हो गया है और वे चाहते हैं कि आगे इस तरह की कोई मुसीबत न खड़ी हो. दिलचस्पी चिट्टियों और अर्ज़ियों में हमारी दिलचस्पी देखकर पूजा करवा रहे पंडित ने मंत्रोच्चारण और वहाँ पर बैठे परिवार से उनका गोत्र पूछने का कार्यक्रम ज़रा तेज़ कर दिया.
उन्होंने हमें बताया कि मान्यता के अनुसार गोलू देवता चम्पावत नामक स्थान में पैदा हुए थे और उनके दो मुख्य मंदिर हैं. एक घोड़ाखाल में और दूसरा अल्मोड़ा के निकट चितई में. पंडित जी के अनुसार गोलू देवता कुमाऊँ के राज परिवार से थे. लेकिन एक कहानी यह भी है कि वह एक मामूली परिवार से थे और न्याय के लिए प्रशासन के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद भी की. गोलू देवता और मंदिर की विशेषता सिर्फ़ लिखित प्रार्थनापत्रों में ही नहीं, भगवान को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद में भी है. मन्नत पूरी हो जाने पर श्रद्धालू यहाँ प्रसाद के अलावा घंटियाँ चढ़ाते हैं. मंदिर के प्रांगण में हर ओर छोटी-बड़ी घंटियाँ लटकी हैं. एक बड़ा सा घंटा हमें दिखा-नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला द्वारा गोलू देवता के मंदिर में चढ़ाया गया. देखिए, मैं आपको कहानी सुनाने में रह गया और अपने लिए मन्नत माँगी ही नहीं. |
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