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सांप्रदायिक सदभाव की ऐसी मिसाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में सांप्रदायिक हिंसा के कई कटु अनुभवों के बीच पश्चिम बंगाल में एक ऐसा मंदिर है जिसकी रक्षा यहाँ के मुसलमान करते हैं. मुर्शिदाबाद ज़िले में बांग्लादेश की सीमा से लगे एक गाँव का यह मंदिर 200 वर्षों से भी ज़्यादा समय से हिंदुओं और मुसलमानों की एकता और सांप्रदायिक सदभाव का प्रतीक बना हुआ है. इस ज़िले के रघुनाथगंज ब्लॉक के भैरवटोला स्थित इस काली मंदिर की देखरेख और संरक्षण का ज़िम्मा मुसलमान ही उठा रहे हैं. मुस्लिम बस्ती में स्थित 200 साल से ज़्यादा पुराने इस मंदिर के पुश्तैनी पुरोहित दिलीप चक्रवर्ती बताते हैं कि मुसलमान नहीं होते तो अभी तक यहाँ मंदिर नहीं बचा होता. इस गाँव के मोहम्मद युसूफ़ बताते हैं कि काली पूजा या दीवाली के मौक़े पर लगता है मानों हमारा अपना त्योहार हो. उस समय मंदिर के पास एक बड़ा मेला लगता है जिसमें दूर-दूर से मुसलमान जुटते हैं. भरोसा इलाक़े की मुस्लिम आबादी इस मंदिर पर काफ़ी भरोसा करती है. उनके मन में विश्वास है कि काली माता ही गाँव को प्राकृतिक विपदाओं से बचाती हैं.
इस्माईल शेख़ बताते हैं कि चार साल पहले भारी बाढ़ में पूरा इलाक़ा डूब गया था लेकिन गाँव में किसी का कोई नुक़सान नहीं हुआ. मुसलमान लोग बताते हैं कि वे यहाँ न तो ख़ुद गंदगी फैलाते हैं और न ही किसी को ऐसा करने देते हैं. ये लोग मंदिर से लगे पुराने पेड़ के पत्ते भी किसी को जलाने नहीं देते. सुनकर भले ही आश्चर्य हो लेकिन मुसलमान लोग यहाँ भोग या प्रसाद भी चढ़ाते हैं. बलि की परंपरा नहीं होने के कारण जानवरों को टीका लगाकर छोड़ दिया जाता है. इस मंदिर की ख़ासियत यह भी है कि यहाँ कोई प्रतिमा नहीं है. एक सिंदूर लगी शिला की ही पूजा होती है. गाँव के लोग शनिवार और मंगलवार को होने वाली पूजा के मौक़े पर यहाँ जुटते हैं और प्रसाद खाते हैं. गाँव के सबसे बुज़ुर्ग 90 वर्षीय चाँद शेख़ बताते हैं कि यहाँ हिंदुओं और मुसलमानों में कभी झगड़ा हुआ हो यह उन्हें याद नहीं. शांति देश बँटवारे के समय भी यहाँ शांति रही और अयोध्या में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद भी. मंदिर के पास स्थित आठ मुस्लिम बस्तियों में 900 से ज़्यादा मुस्लिम परिवार रहते हैं. उनसे कुछ दूर हिंदुओं के 400 घर हैं. मुस्लिम भक्तों से मिलने वाले चढ़ावे से ही पुजारी दिलीप चक्रवर्ती का घर चलता है. इसी गाँव के मोमिन और ज़ब्बर इस मंदिर को हिंदू मुसलमान के सदभाव का केंद्र मानते हैं. वे कहते हैं कि इस छोटे से मंदिर ने इन दोनों धर्मों के लोगों को इस सूत्र में जोड़ने का बड़ा काम किया है. मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते समय कभी हिंदू-मुसलमान या छुआछूत की भावना नहीं उठती. इलाक़े के मुसलमान यहाँ मन्नत मानते हैं और उसके पूरे होने पर भोग चढ़ाते हैं. मक़बूल मियाँ बताते हैं, " अयोध्या या गोधरा से तो हमारा पेट नहीं भर सकता. हमने बाप-दादाओं से सीखा है जान देकर भी इस मंदिर की हिफ़ाज़त करना और हम अपनी औलादों को भी यही सिखा रहे हैं." बड़ों की इस सीख के चलते ही यहाँ के बच्चे हिंदू-मुसलमान नहीं बल्कि इंसान बनकर जी रहे हैं. |
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