BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
सोमवार, 16 फ़रवरी, 2004 को 16:19 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
बेकार लकड़ी काम की बनी

लैंटाना लकड़ी
अब तक लैंटाना को केवल खरपतवार ही समझा जाता था
खेती और जंगल के लिए घातक और हमारे आसपास तेज़ी से फैलने वाले लैंटाना की झाड़ी से सुंदर टिकाउ और सस्ते फर्नीचर भी बनाए जा सकते हैं.

ये शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा लेकिन ये काम कर दिखाया है उत्तरांचल की एक संस्था ने और अब इसके व्यवसायिक उत्पादन के लिए राज्य सरकार भी आगे आ रही है.

ये ख़ूबसूरत सोफा सेट, ये रैक और ये मेज़- बेंत के नहीं, खेती बागवानी और जंगल के दुश्मन कहे जाने वाले लैंटाना से बने हैं.

ख़ूबसूरती और टिकाऊपन में इनकी तुलना अच्छे से अच्छे शोरूम में बिकनेवाले बेंत के फर्नीचर से की जा सकती है.

 इस झाड़ के सफ़ाए के लिए सरकारी और गैर सरकारी तौर पर कई कार्यक्रम चलाए गए जिसमें बड़े पैमाने पर धन भी खर्च किया गया. लेकिन सब बेकार रहा. चाहे वो झाड़ जलाना हो, चिड़ियां से इसके बीज चुगाना हो या पौधे को जड़ से उखाड़ना , कुछ भी रहा हो . इसलिए अब इसके उन्मूलन का सबसे अच्छा तरीका है इसका ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग.
डॉक्टर अनिल जोशी

आज ये पहाड़ों में अमरनाथ जैसे ऐसे कई युवाओं के लिए आय का अच्छा स्रोत है जिन्हें दर दर भटकने के बाद भी नौकरी हाथ नहीं आई.

देहरादून के क़रीब अपने गांव पाववाला सौड़ा में अमरनाथ पिछले ढाई साल से लैंटाना से फर्नीचर बनाकर अपनी आजीविका कमा रहे है.

वो कहते है, “पहले तो लोग लैंटाना से परेशान थे लेकिन अब तो इसके फर्नीचरों की काफी डिमांड हैं . बेंत का फर्नीचर सेट जहां तीन हज़ार रूपए से कम नहीं होता वहीं उसी की तरह दिखनेवाला लैंटाना का फर्नीचर सिर्फ पांच सौ से सात सौ में तैयार हो जाता है.”

स्थानीय बोलचाल में कुकरी के नाम से चर्चित इस झाड़ी का वैज्ञानिक नाम है लैंटाना कैमारा.

और ये दुनिया की दस सबसे ज़्यादा बुरी खतपतवार में एक है.

1875 में प्रकाशित 'द फ्लोरा ऑफ ब्रिटिश इंडिया' के अनुसार दक्षिण अमेरिका मूल के इस पौधे को अंग्रेज़ सजावटी पौधे या हेज प्लांट के रूप में हिंदुस्तान लाए थे.

तेज़ी से फैलाव

लैंटाना का पौधा 1800 मीटर तक की ऊंचाई तक आसानी से पनप सकता है जहां इतनी ऊंचाई तक कोई और पौधा नहीं पनप सकता वहां लैंटाना किसी भी परिस्थिति में एक बार पनपने के बाद बड़ी तेज़ी से फैलता है.

लैंटाना लकड़ी
लैंटाना का इस्तेमाल फ़र्नीचर बनाने में हो रहा है

इसके बढते सैलाब से जंगल, चरागाह और खेती की ज़मीन बंजर होती जा रही है. हिमालयी क्षेत्रों में इस झाड़ ने जैव विविधता के लिए खासतौर पर संकट पैदा कर दिया है.

हिमालयन एन्वायरमेंटल स्टडीज़ एंड कंज़रवेशन ऑरगोनाईजेशन नाम की एक स्वयंसेवी संस्था ने कई साल के शोध और अध्ययन के बाद इस अनुपयोगी झाड़ के उपयोग के कुछ तरीके निकाले जिनमें फर्नीचर निर्माण भी शामिल है.

संस्था के निदेशक डॉ अनिल जोशी कहते हैं, “इस झाड़ के सफाए के लिए सरकारी और गैर सरकारी तौर पर कई कार्यक्रम चलाए गए जिसमें बड़े पैमाने पर धन भी खर्च किया गया".

"लेकिन सब बेकार रहा. चाहे वो झाड़ जलाना हो, चिड़ियां से इसके बीज चुगाना हो या पौधे को जड़ से उखाड़ना , कुछ भी रहा हो . इसलिए अब इसके उन्मूलन का सबसे अच्छा तरीका है इसका ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग".

फर्नीचर के अलावा लैंटाना से चारकोल, अगरबत्ती भी बनाए जा रहे हैं.

इस प्रयोग की सफलता ने राज्य सरकार का भी ध्यान खींचा है और इस संस्था के तकनीकी सहयोग से राज्य में इसे स्वरोज़गार का एक उद्योग बनाया जा रहा है.

पिछले सप्ताह उत्तरांचल की राज़धानी देहरादून में इस विषय पर हुई दो दिन की वर्कशॉप में राज्य सरकार ने इसके लिए सरकारी पहल की शुरूआत के तौर पर आठ ज़िलों में 250 लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण और आर्थिक और तकनीकी मदद देने की घोषणा की है.

इससे जुड़ी ख़बरें
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>