|
बेकार लकड़ी काम की बनी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
खेती और जंगल के लिए घातक और हमारे आसपास तेज़ी से फैलने वाले लैंटाना की झाड़ी से सुंदर टिकाउ और सस्ते फर्नीचर भी बनाए जा सकते हैं. ये शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा लेकिन ये काम कर दिखाया है उत्तरांचल की एक संस्था ने और अब इसके व्यवसायिक उत्पादन के लिए राज्य सरकार भी आगे आ रही है. ये ख़ूबसूरत सोफा सेट, ये रैक और ये मेज़- बेंत के नहीं, खेती बागवानी और जंगल के दुश्मन कहे जाने वाले लैंटाना से बने हैं. ख़ूबसूरती और टिकाऊपन में इनकी तुलना अच्छे से अच्छे शोरूम में बिकनेवाले बेंत के फर्नीचर से की जा सकती है. आज ये पहाड़ों में अमरनाथ जैसे ऐसे कई युवाओं के लिए आय का अच्छा स्रोत है जिन्हें दर दर भटकने के बाद भी नौकरी हाथ नहीं आई. देहरादून के क़रीब अपने गांव पाववाला सौड़ा में अमरनाथ पिछले ढाई साल से लैंटाना से फर्नीचर बनाकर अपनी आजीविका कमा रहे है. वो कहते है, “पहले तो लोग लैंटाना से परेशान थे लेकिन अब तो इसके फर्नीचरों की काफी डिमांड हैं . बेंत का फर्नीचर सेट जहां तीन हज़ार रूपए से कम नहीं होता वहीं उसी की तरह दिखनेवाला लैंटाना का फर्नीचर सिर्फ पांच सौ से सात सौ में तैयार हो जाता है.” स्थानीय बोलचाल में कुकरी के नाम से चर्चित इस झाड़ी का वैज्ञानिक नाम है लैंटाना कैमारा. और ये दुनिया की दस सबसे ज़्यादा बुरी खतपतवार में एक है. 1875 में प्रकाशित 'द फ्लोरा ऑफ ब्रिटिश इंडिया' के अनुसार दक्षिण अमेरिका मूल के इस पौधे को अंग्रेज़ सजावटी पौधे या हेज प्लांट के रूप में हिंदुस्तान लाए थे. तेज़ी से फैलाव लैंटाना का पौधा 1800 मीटर तक की ऊंचाई तक आसानी से पनप सकता है जहां इतनी ऊंचाई तक कोई और पौधा नहीं पनप सकता वहां लैंटाना किसी भी परिस्थिति में एक बार पनपने के बाद बड़ी तेज़ी से फैलता है.
इसके बढते सैलाब से जंगल, चरागाह और खेती की ज़मीन बंजर होती जा रही है. हिमालयी क्षेत्रों में इस झाड़ ने जैव विविधता के लिए खासतौर पर संकट पैदा कर दिया है. हिमालयन एन्वायरमेंटल स्टडीज़ एंड कंज़रवेशन ऑरगोनाईजेशन नाम की एक स्वयंसेवी संस्था ने कई साल के शोध और अध्ययन के बाद इस अनुपयोगी झाड़ के उपयोग के कुछ तरीके निकाले जिनमें फर्नीचर निर्माण भी शामिल है. संस्था के निदेशक डॉ अनिल जोशी कहते हैं, “इस झाड़ के सफाए के लिए सरकारी और गैर सरकारी तौर पर कई कार्यक्रम चलाए गए जिसमें बड़े पैमाने पर धन भी खर्च किया गया". "लेकिन सब बेकार रहा. चाहे वो झाड़ जलाना हो, चिड़ियां से इसके बीज चुगाना हो या पौधे को जड़ से उखाड़ना , कुछ भी रहा हो . इसलिए अब इसके उन्मूलन का सबसे अच्छा तरीका है इसका ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग". फर्नीचर के अलावा लैंटाना से चारकोल, अगरबत्ती भी बनाए जा रहे हैं. इस प्रयोग की सफलता ने राज्य सरकार का भी ध्यान खींचा है और इस संस्था के तकनीकी सहयोग से राज्य में इसे स्वरोज़गार का एक उद्योग बनाया जा रहा है. पिछले सप्ताह उत्तरांचल की राज़धानी देहरादून में इस विषय पर हुई दो दिन की वर्कशॉप में राज्य सरकार ने इसके लिए सरकारी पहल की शुरूआत के तौर पर आठ ज़िलों में 250 लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण और आर्थिक और तकनीकी मदद देने की घोषणा की है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||