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सोमवार, 08 दिसंबर, 2003 को 21:12 GMT तक के समाचार
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तुग़लक़ को नहीं मारा जाएगा

तुग़लक़ घोड़ा
तुग़लक़ को भारतीय सैन्य अकादमी की शान कहा जाता है

देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी यानी आईएमए में पिछले ग्यारह साल से पासिंग आउट परेड का नेतृत्व करने वाले घोड़े तुग़लक़ को जीवनदान दिया जा रहा है.

सेना में आमतौर पर घोड़ों के बूढ़े और लाचार हो जाने के बाद उन्हें मार दिया जाता है. लेकिन अकादमी ने तुग़लक़ के साथ ऐसा न करने का फ़ैसला किया है.

तुग़लक़ को प्राकृतिक मौत तक अकादमी में ही रहने दिया जाएगा.

लगभग छह फ़ुट ऊँचा, उजला और गर्वीला तुग़लक़ भले ही अब वहाँ से पास होने वाली सेना के अफ़सरों की परेड का नेतृत्व नहीं करेगा लेकिन अकादमी की शान बना रहेगा.

शायद कम ही लोगों को मालूम होगा कि अकादमी में अंग्रेज़ी राज के समय से यह नियम चला आ रहा है कि घोड़ों को बूढ़ा और अक्षम होने के बाद डॉक्टर के परामर्श से गोली मार दी जाती है.

 जैसे किसी 70 साल के आदमी को जोड़ों में दर्द रहने लगता है और उसे तरह-तरह की बीमारियाँ घेर लेती हैं, ठीक उसी तरह एक घोड़े की भी यही स्थिति हो जाती है

एक सैन्य अधिकारी

कभी-कभी कुछ ख़ुशक़िस्मत घोड़ों को कोई क्लब या संस्था ख़रीद लेती है.

आईएमए के घुड़सवार अधिकारी कर्नल सुनील शिवदास बताते हैं, "अगर कोई घोड़ा 20 साल का हो जाता है तो उसके बाद वह सेना में सक्रिय सेवा के लायक़ नहीं रह पाता".

"जैसे किसी 70 साल के आदमी को जोड़ों में दर्द रहने लगता है और उसे तरह-तरह की बीमारियाँ घेर लेती हैं, ठीक उसी तरह एक घोड़े की भी यही स्थिति हो जाती है".

"इसके बाद हम सब घोड़ों को रख भी नहीं सकते और न ही उन्हें कहीं और ऐसी देखभाल मिल सकती है. इसलिए यह क्रूर भले ही लगे लेकिन उन्हें मार दिया जाता है".

लेकिन तुग़लक़ के साथ ऐसा करते हुए फ़ौजी अफ़सरों का भी दिल पसीज गया.

सबसे ख़ुश तुग़लक़ के साईस हैं

तुग़लक़ पिछले 11 साल से अकादमी में है और बीस पासिंग आउट परेडों का नेतृत्व कर चुका है.

देहरादून स्थित सैन्य अकादमी थलसेना अधिकारियों को प्रशिक्षण देने वाला प्रमुख संस्थान है और हर वर्ष यहाँ से क़रीब साढ़े चार हज़ार अधिकारी निकल कर सेना में शामिल होते हैं.

अकादमी के सत्तर साल पूरे होने जो जश्न हुआ था उसमें भी जनरल मानेकशॉ की अगुवाई में पासिंग आउट परेड में तुग़लक़ शामिल था.

एक सैन्य अधिकारी कर्नल मनमेघ सिंह कहते हैं, "भावनात्मक जुड़ाव की वजह से तुग़लक़ को आख़री साँस तक यहीं रखने का फ़ैसला किया गया".

"इतने अच्छे घोड़े को जिसके साथ हज़ारों अफ़सरों की, अकादमी की संवेदनाएँ जुड़ी हैं, कैसे जाने देते. अकादमी के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है".

 इतने अच्छे घोड़े को जिसके साथ हज़ारों अफ़सरों की, अकादमी की संवेदनाएँ जुड़ी हैं, कैसे जाने देते. अकादमी के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है

एक सैन्य अधिकारी

तुग़लक़ को मिले जीवनदान से सबसे ज़्यादा ख़ुश हैं उसके साईस जो इतने साल से अपने बच्चे की तरह उसकी देखभाल कर रहे हैं.

ख़ास बात यह है कि हमेशा से अकादमी के प्रधान घोड़े के तौर पर सफ़ेद घोड़े का ही चयन किया जाता है.

तुग़लक़ की जगह अब नए घोड़े को ट्रेनिंग दी जा रही है और अगले सप्ताह होने वाली पासिंग आउट परेड में वही परेड का नेतृत्व करेगा.

तुग़लक़ शायद अस्तबल से अपने उत्तराधिकारी को निहारेगा.

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