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अल्मोड़ा में चीनी लोगों का एक गाँव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तरांचल के अल्मोड़ा ज़िले का गाँव चौना एक अनूठा गाँव बन गया है. इस गाँव की 90 फ़ीसदी आबादी चीनी मूल के लोगों की है. गाँव के शेष दस प्रतिशत लोगों में घुलमिलकर इन लोगों ने गाँव को भारत-चीन का सांस्कृतिक संगम बना दिया है. चीनी मूल का पहला परिवार इस गाँव में सन् 1890 के दशक में आया. इन लोगों को ब्रितानी हुकूमत अपने कौसानी स्थित चाय बगीचों को चलाने के लिए दार्जीलिंग के रास्ते चीन वाले हिस्से से लाई थी. इन चीनवासियों को चाय के काम में महारत हासिल थी इसलिए इनके परिवार तब कौसानी के आसपास रहकर चाय बगीचों के काम पर लग गए. चीनी से चौना पहले तो वे एक साथ रहते थे लेकिन बाद में परिवार अलग-अलग रहने लगे. चाय की नर्सरियाँ तो अंग्रेजों के साथ ही वीरान हो गई. ये चीनी परिवार डंगोली, डुमलोट, टीट बाजार, मुक्तेश्वर आदि गाँवों में चले गए. एक परिवार कौसानी के पास, आगरपचीसी गाँव सभा के एक गाँव में बस गया. एक परिवार की वंशबेली ऐसी बढ़ी कि आज पूरा गाँव इसी चीनी मूल के परिवार का हो गया है. इस गाँव का नाम भी "चीनी" से "चौना" हो गया. जबकि अन्य गाँवों में गए लोग बिखरे हुए हैं. "चौना" नामक इस गाँव के चीनी मूल के लोग अब चीन का नाम लेने में संकोच करते हैं. उनका कहना है, "हमारे पूर्वज जब प्रथम विश्वयुद्ध से पूर्व चीन से आए तो उन्होंने वहाँ के एक राष्ट्रवादी नेता संयत शेन से प्रभावित होकर अपने नाम के आगे "सेन" जोड़ा था. अब जबकि हम भारतीय हैं." वे अब माँग करने लगे हैं कि उन्हें भारत के अनुसूचित जातियों में शामिल कर लेना चाहिए. वे कहते हैं, "हमारा वहाँ लौटने का न तो इरादा है न माहौल. हमें भारत के अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए. क्योंकि हमारी ब्याह-शादी इन्हीं अनुसूचित जाति के लोगों से होती रही है." चौना गाँव के प्रेम सेन का कहना है कि "सेन" लगने की वजह से हमें समाज में अलग देखा जाता है जो कि हमें अच्छा नहीं लगता. गाँव के बुज़ुर्ग इन्द्र सेन का कहना है, "हमने अपने सारे रीति-रिवाज़ हिन्दुओं व अन्य ग्रामीणों की तरह ही कर लिए हैं. हमारी औरतें व बेटियाँ तो अब अनुसूचित जाति के ही लोगों को ब्याही जा रही हैं. "सेन" नाम की वजह से हमें आरक्षित श्रेणी का भी लाभ नहीं मिल रहा." आजीविका गाँव के अधिकांश मवासे पशुपालन पर आश्रित हैं. और यह 60 के करीब जनसंख्या वाला यह चीनीयों का एकमात्र गाँव है. इन्द्रसेन का कहना है कि उनका गाँव सबसे बड़ा होने के बावजूद चीनी मूल का कोई व्यक्ति अब तक आगरपचीसी गाँव सभा का प्रधान नहीं बन सका हालांकि उनको संतोष है कि गाँव व समीपवर्ती इलाके के लोग उन्हें इज्जत की नजरों से देखते हैं. शादी-ब्याह में उनको निमंत्रण मिलता है. गाँव बिरादरी उनसे भेदभाव नहीं करती.
उत्तरांचल में ब्रितानी हुकूमत के समय चीनी मूल के लोगों में से शेन व चौफीन बिरादरी के लोगों को कुमाऊ के कौसानी व गढ़वाल के लैंड्सडाउन व पौड़ी इलाके में लाया गया था. इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक के अनुसार चौफीन लोग तो समय की नब्ज भाँपते हुए या तो गढ़वालियों से मिलजुल गए या फिर उन्होंने इसाइयत कबूल कर ली. इस कारण वे शिक्षा में काफी आगे बढ़ गए. उनके लोग लखनऊ विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार व गढ़वाल में डिप्टी रजिस्टार तक के पदों पर पहुँचे. लेकिन "सेन" बिरादरी के लोग अलग-थलग पड़े रहने से शिक्षा हासिल नहीं कर पाए. इसका नतीजा यह हुआ कि इनकी बिरादरी से दो तीन लोग भारतीय सेना के ही सिपाही तो एकाध लोग मज़दूर बनकर ही सेवानिवृत हो गए. आज कोई भी व्यक्ति इस गाँव का सरकारी सेवा में नहीं है. बच्चे अधिकांश तौर पर पाँचवीं के बाद स्कूल छोड़ देते हैं. अब जब उत्तरांचल सरकार चाय बागानों को पुनर्जीवित कर कौसानी आदि में चाय की खेती को बढ़ावा दे रही है तो चीनी मूल के लोगों के किसी व्यक्ति के किसी वारिस को वहाँ नौकरी नहीं मिली. इससे भी वे चीनी मूल के लोग निराश लगते हैं. उनका कहना है कि उन्हें चाय का अनुभव अब भी है, लेकिन हमारी तरफ सरकार का ध्यान नहीं है. |
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