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चिपको की गूंज संयुक्त राष्ट्र में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चिपको का अलख जगाने वाली गौरा देवी के साथ-साथ चमोली में इस आंदोलन की कमान संभालने वाली दूसरी महिला थीं बाली देवी. उन्हें इस बार संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर बुलाया गया था. बाली देवी 45 देशों की उन महिलाओं में थीं जिन्हें पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के लिए ये गौरव हासिल हुआ. शांति के लिए नोबल पुरस्कार पाने वाली केन्या की वंगारी मथाई ने इस बैठक की अध्यक्षता की. गौरा देवी अब नहीं हैं लेकिन बाली देवी कहती हैं, "मैं गौरा का संदेश लेकर वहाँ गई कि पेड़ हैं तो जीवन हैं." पाखी और अंगडू की परंपरागत पोशाक पहने बाली ने जब अपना भाषण दिया तो देर तक तालियाँ बजती रहीं. उन्होंने कहा "पहाड़ हमारे लिए भगवान हैं और पेड़ हमारे लिए पूजा. भारत में हो या फिर दुनिया में कहीं भी पेड़ पौधे, नदी- झरने,पहाड़ सभी जगह एक जैसे हैं. चांदनी की जो किरणें धरती पर गिरती हैं वो भी सभी जगह एक जैसी ही हैं. पर्यावरण को बचाने के लिये हमारी लड़ाई एक ही है. हम सब बहनें एक हैं." बाली देवी को इस बात पर बहुत अचरज हुआ कि चिपको के बारे में वहाँ काफी लोग जानते थे,”लोगों ने बड़ी दिलचस्पी से इसके बारे में और जानना चाहा कि कैसे हमने पेड़ों से चिपक-चिपक कर उन्हें बचाया.” |
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