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मंगलवार, 23 नवंबर, 2004 को 08:07 GMT तक के समाचार
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उत्तरांचल के लोकवाद्यों का अनूठा ऑर्केस्ट्रा

उत्तरांचल का लोकवाद्यों का ऑर्केस्ट्रा
लोकवाद्यों की परंपरा धीरे-धीरे ख़त्म होती जा रही थी
उत्तरांचल के हिमालयी क्षेत्रों में ढोल वादन की बहुत पुरानी और समृद्ध परंपरा रही है लेकिन समय के साथ ढोल का शास्त्र और इसे बजानेवाले कलाकार हाशिये पर जाने लगे थे.

ऐसे में कुछ संस्कृतिकर्मियों और लोककलाकारों ने ढोल और सोलह ठेठ पहाड़ी साज़ों को मिलाकर अनूठा ऑर्केस्ट्रा तैयार किया है.

अब तक इन साज़ों को अलग-अलग ही बजाया जाता था या ज़्यादा से ज़्यादा दो या तीन साज की जुगलबंदी होती थी.

लेकिन पहली बार एक दर्जन से अधिक लोकवाद्यों को एक साथ एक जगह रख दिया गया है.

दर्जन भर वाद्य

अब ढोल, दमाऊ, हुड़का, मुर्छुंद, थाली, करनाल, मशकबीन, अलगोजा, डाँर, दांया और बांया नगाड़ा, पकोरे, रणसींगा तथा स्कॉटिश बैगपाइप की संगत कराई गई है.

स्कॉटिश बैगपाइप तो अंग्रेजों के जमाने में सेना के जरिये यहां पंहुचा फिर यहीं के वाद्य परिवार में शामिल हो गया.

 हमारी कोशिश इन वाद्यों और इन्हें बजानेवालों को पेशेवर रूप देकर इन्हें मान्यता दिलाने की है. ढोल नाद के जरिये कलाकारों को सम्मान और पैसा मिल जाए और लोककला की सुंदरता भी बरकरार रहे
नरेंद्र सिंह, लोकगायक

इस ऑर्केस्ट्रा से लुप्त हो रहे कई साजों और धुनों को एक नया जीवन मिल गया है.

मशहूर लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी कहते हैं, "हमारी कोशिश इन वाद्यों और इन्हें बजानेवालों को पेशेवर रूप देकर इन्हें मान्यता दिलाने की है. ढोल नाद के जरिये कलाकारों को सम्मान और पैसा मिल जाए और लोककला की सुंदरता भी बरकरार रहे."

पहाड़ में ढोल के महत्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां न केवल ढोल बजाने की कई अलग-अलग शैलियाँ हैं बल्कि सैकड़ों ताल प्रचलित हैं.

दंतकथा

ढोल के व्याकरण और इसकी उत्पत्ति को लेकर यहां एक मौखिक परंपरा भी रही है जिसे “ढोल सागर” कहते हैं.

उत्तरांचल का लोकवाद्यों का ऑर्केस्ट्रा
ढोल की एक अलग परंपरा रही है

दंतकथाओं के अनुसार ढोल की उत्पत्ति शिव के डमरू से हुई है और ढोल सागर को सबसे पहले स्वयं शिव ने पार्वती को सुनाया था. जब वो इसे सुना रहे थे तब वहाँ मौजूद एक गण ने इसे कंठस्थ कर लिया.

तब से ही ये पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से चला आ रहा है.

वैसे मूल ग्रंथ संस्कृत और गढ़वाली बोली में है.

ढोलसागर में प्रकृति, मनुष्य, देवताओं और त्योहारों को समर्पित 300 से ज्यादा ताल हैं. ढोल सागर पर शोध कर रहे गढ़वाल विश्वविद्यालय में प्रो. डी.आर. पुरोहित कहते हैं, “उत्तरांचल की सभी छह घाटियों धौलीगंगा, मंदाकिनी, टिहरी, गंगोत्री, यमुना और जौनसार बाबर के ढोलों में लय और ताल की विभिन्नता देखने लायक है, जैसे मंगल बड़ई का ताल टिहरी में अलग है और पौड़ी में इसका मात्राएँ अलग हैं और इस वैविध्य को देखें तो ढोलसागर के कुल तालों की संख्या लगभग 600 हो जाती हैं.”

ढोल और दमाऊ एक तरह से मध्य हिमालयी यानी उत्तरांचल के पहाड़ी समाज की आत्मा रहे हैं.

जन्म से लेकर मृत्यु तक, घर से लेकर जंगल तक कहीं कोई संस्कार या सामाजिक गतिविधि नहीं जो ढोल और इन्हें बजानेवाले ‘औजी’ या ढोली के बगैर पूरा होता हो.

औजी प्राय: समाज के निम्न वर्ग के लोग होते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी श्रद्धा और उल्लास से इस दायित्व को निभाते आ रहे हैं.

संरक्षण

पूरा गांव इनका संरक्षक होता है और इन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता है लेकिन सदियों से चली आ रही ये व्यवस्था अब तेज़ी से बिखरने लगी है.

 हमने तो अपने बाप-दादा से खुशी-खुशी सीखा लेकिन हमारे बच्चे इससे दूर होते जा रहे हैं .अब ढोल वही सीखते हैं जिनकी मजबूरी होती है.लोग भी अब फिल्मी बैंड ही ज्यादा पसंद करने लगे हैं
सोहनलाल

ढोल ऑर्केस्ट्रा के सदस्य पौड़ी के ढोली सोहनलाल कहते हैं, "हमने तो अपने बाप-दादा से खुशी-खुशी सीखा लेकिन हमारे बच्चे इससे दूर होते जा रहे हैं .अब ढोल वही सीखते हैं जिनकी मजबूरी होती है.लोग भी अब फिल्मी बैंड ही ज्यादा पसंद करने लगे हैं."

हांलाकि ढोल ऑर्केस्ट्रा ने सोहनलाल जैसे कलाकारों में उम्मीद भी जगाई है.

एक और ढोली जयलाल कहते हैं, “इस ऑर्केस्ट्रा को काफी सराहा जा रहा है और कुछ और उत्साही लोगों ने इसी तर्ज पर ढोल बैंड बनाया है. ऐसे बैंड शादी-ब्याह और मुंडन में खूब बुलाए जाते हैं.”

सरकार ने भी ढोल ऑर्केस्ट्रा को उद्योग का दर्जा देने की मांग स्वीकार कर ली है और अब जल्द ही इससे जुड़े कलाकारों को वित्तीय मदद भी मिलने लगेगी.

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