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'दंगों के लिए स्थानीय नेता ज़िम्मेदार' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद भड़के 1984 के सिख विरोधी दंगों की जाँच करने वाली नानावती आयोग की रिपोर्ट सोमवार को संसद में पेश कर दी गई है. गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने इसे लोकसभा में पेश किया. इस रिपोर्ट के साथ कार्रवाई की रिपोर्ट भी पेश की गई है. इन दंगों में लगभग तीन हज़ार सिख मारे गए थे. नानावती आयोग ने अपनी रिपोर्ट में एक ओर तो राजीव गाँधी और कांग्रेस के बड़े नेताओं को दोष मुक्त कर दिया है लेकिन लिखा है कि जो भी कांड हुए वे स्थानीय कांग्रेस नेताओं के उकसाने पर ही किए गए. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, "राजनेता भी अपना महत्व, लोकप्रियता और जनता के ऊपर अपनी पकड़ दिखाकर लोगों को भड़काकर स्थिति का नाजायज़ फ़ायदा उठाने लगे थे." अपनी इस रिपोर्ट में नानावती आयोग ने कहा है कि कांग्रेस के नेता और पूर्व सांसद धरमदास शास्त्री के ख़िलाफ़ इस बाद के सबूत हैं कि उन्होंने अपने दो व्यक्तियों को उकसाकर सिखों पर हमले करवाए. लेकिन केंद्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर पर सीधे आरोप लगाने के स्थान पर कहा गया है कि 'इस बात के पुख़्ता साक्ष्य हैं कि संभवत: सिखों पर हमले कराने में उनका हाथ था.' इसी तरह कांग्रेस सासंद सज्जन कुमार के बारे में आयोग की रिपोर्ट में सीधे कोई आरोप लगाने के स्थान पर कहा गया है कि जो मामले उनके ख़िलाफ़ दर्ज हैं उनकी जाँच करना चाहिए. न्यायमूर्ति जीटी नानावती ने अपनी रिपोर्ट में दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल पीजी गवई के बारे में कहा है कि दिल्ली में क़ानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी उनकी थी इसलिए उन्हें विफलता की ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता. इसी तरह तत्कालीन पुलिस कमिश्नर एससी टंडन के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है क़ानून व्यवस्था की विफलता के लिए उन्हें भी दोषी ठहराया जाना चाहिए. उसके अलावा दंगों से प्रभावित इलाकों में तैनात बहुत से पुलिस अधिकारियों और थाना प्रभारियों को दाषी ठहराया गया है. आयोग ने कहा है कि पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों ने दंगों को रोकने और दंगा पीड़ितों को बचाने के लिए त्वरित और पर्याप्त कार्रवाई नहीं की. नानावती कमीशन ने यह भी कहा है कि सेना को बुलाने में देर हुई.
आयोग ने कहा सरकार से कहा है कि इन दंगों से जो लोग भी प्रभावित हुए उन्हें मुआवज़ा दिया जाना चाहिए. कार्रवाई रिपोर्ट नानावती आयोग की रिपोर्ट के साथ केंद्र सरकार ने कार्रवाई रिपोर्ट भी पेश की है. सरकार ने कहा है कि जो पुलिस अधिकारी और कर्मचारी सेवानिवृत हो चुके हैं उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में दिक्कत होगी. केंद्रीय गृहमंत्रालय ने कहा है कि करोलबाग़ इलाके में जो मामला दर्ज करवाया गया था उसमें कांग्रेस नेता धरमदास शास्त्री का नाम नहीं था. इस बारे में आगे जाँच की बात कही गई है. सरकार ने जगदीश टाइटलर पर किसी भी तरह की कोई कार्रवाई करने से इंकार करते हुए कहा कि चूंकि आयोग ने कहा है कि वे इसमें शामिल हो सकते हैं, तो संभावना को आधार बनाकर किसी पर कार्रवाई करना संभव नहीं है. सज्जन कुमार के बारे में सरकार ने कहा कि चूंकि आयोग के सामने जिन 18 लोगों ने शपथ पत्र दिया उनमें से किसी ने भी सज्जन कुमार का नाम नहीं लिया है. सरकार ने पुराने एफ़आईआर की चर्चा करते हुए कहा है कि इसमें भी सज्जन कुमार का नाम नहीं था. इसलिए पुराने मामलों को फिर से खोलने का कोई औचित्य नहीं है. सरकार ने तत्कालीन उपराज्यपाल के विषय में कहा है कि उन्हें तत्काल स्थानांतरित कर प्रशासनिक क़दम उठाए गए थे. सरकार के अनुसार पुलिस कमिश्नर टंडन को भी तत्काल हटा दिया गया था. मुआवज़े को लेकर सरकार ने कहा है कि केंद्र सरकार की ओर से पहले ही मुआवज़ा दिया जा चुका है और केंद्र सरकार राज्य सरकारों से कहेगी कि वह 84 के दंगों से प्रभावित लोगों को मुआवज़ा दे. पाँच साल पुराना आयोग पाँच वर्ष पहले एनडीए सरकार ने इस आयोग का गठन किया था. इस आयोग ने जाँच करने के बाद इस वर्ष फ़रवरी में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया था. इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की माँग को लेकर विपक्ष ने ख़ासा हंगामा किया था. विपक्ष का कहना था कि इसमें सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं का नाम आने की वजह से सरकार इसे सार्वजनिक करने से कतरा रही है. विपक्ष बजट सत्र से ही इस पर कार्रवाई करने की मांग कर रहा है. विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि इन दंगों में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार, हरकिशन लाल भगत और केंद्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर की भूमिका थी. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने चार दिन पहले ही इस मामले की कार्रवाई रिपोर्ट को मंज़ूरी दी थी. कई आयोग 1984 के सिख विरोधी दंगों की जाँच के लिए आयोग बनाए जा चुके हैं. राजीव गाँधी सरकार ने रंगनाथ मिश्र आयोग का गठन किया था जिसने अपनी रिपोर्ट 1986 में दी थी. इसके बाद जैन-बनर्जी समिति बनाई गई जिसका काम इस बात की जाँच करना था कि ऐसे कौन से मामले थे जिनमें शिकायतकर्ता के सामने नहीं आने के कारण कार्रवाई नहीं हुई. 1984 के सिख विरोधी दंगों में आहूजा समिति की रिपोर्ट के अनुसार 2700 से अधिक लोग मारे गए थे. |
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