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पूरा राजनैतिक परिदृश्य ही बदला हुआ है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाँच साल पहले ख़ालसा पंथ के तीन सौ साल पूरे होने पर जब पंजाब विशाल समारोह आयोजित किए गए तो सिखों की अलग पहचान और सिख क़ौम व पर्सनल लॉ की बात ज़ोर-शोर से की जा रही थी. लेकिन अब जब गुरु ग्रंथ साहब की स्थापना के चार सौ साल पूरे होने के अवसर पर पंजाब का पूरा राजनैतिक परिदृश्य बदला हुआ नज़र आता है. राजनैतिक माहौल में बदलाव का सूचक हैं - सिख नेताओं, एसजीपीसी के वरिष्ठ सदस्यों और विशेष तौर पर सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख़्त के जथेदार के बयान. 'आतंकवाद के लिए जगह नहीं' अकाल तख़्त के जथेदार ज्ञानी जोगिंदर सिंह वेदांती ने ज़ोर देकर कहा है कि सिख धर्म में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है और इसकी सबको निंदा करनी चाहिए. उन्होंने भारत को मज़बूत राष्ट्र बनाने में सिखों की भूमिका की भी प्रशंसा की है. ज्ञानी जोगिंदर सिंह वेदांती ने ज़ोर दिया है कि गुरु ग्रंथ साहब में सिख गुरुओं की बानी के साथ-साथ हिंदू भक्तों और सूफ़ी संतों की वाणी भी है इसलिए सब धर्म, जातियों और प्रांतों के लोगों के लिए इसका महत्व है. एसजीपीसी के कार्यकारी अध्यक्ष अलविंदर पाल सिंह पक्खोके ने सभी भारतीयों और प्रवासी भारतीयों से अपील की है कि वे इस मौके पर अपने घरों में दीपमाला करें. ख़ालसा त्रिशताब्दी का माहौल और यदि 1999 में ख़ालसा पंथ की त्रिशताब्दी का ध्यान करें तो अकाली दल में चल रहे अंतरकलह और अकाल तख़्त के जथेदार भाई रणजीत सिंह के कट्टरपंथी बयानों की तस्वीर सामने आती है. उस समय भाई रणजीत सिंह ने अलग सिख क़ौम और सिखों के लिए अलग पर्सनल लॉ की बात की थी. उस समय के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने धार्मिक क्षेत्र में ये सोचकर कदम रखा था कि एसजीपीसी अध्यक्ष गुरचरण सिंह टोहड़ा और भाई रणजीत सिंह को राजनीतिक तौर पर ख़त्म किया जाए.
और बादल ने कट्टरपंथियों के साथ राजनैतिक लड़ाई लड़ने की जगह व्यक्तियों को निशाना बनाना शुरु कर दिया. ये पूरा प्रकरण 1997 में शुरु हुआ जब टोहड़ा ने कट्टरपंथी सिख नेता जरनैल सिंह भिंडरांवाले के पुत्र और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और जनरल एएस वैद्या के हत्यारों के परिजनों को सम्मानित किया. ये उस दौर की शुरुआत थी जब पार्टी में मतभेदों को हल करने के लिए धार्मिक कट्टरपंथ का सहारा लिया गया. ख़ालसा त्रिशताब्दी से पहले जनवरी 1999 में तब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों ने अमृत का सेवन किया और अमृतधारी सिख बने लेकिन इससे टोहड़ा की कट्टरपंथी और धर्म के आधार पर की जाने वाली विचारधारा को ही बल मिला. लेकिन 2004 में अमृत का सेवन और अन्य धार्मिक काम धर्म के क्षेत्र में ही रहा है और अकाली दल या काँग्रेस के किसी भी गुट ने इसे राजनीति में लाने की कोशिश नहीं की है. ये विवाद कि 1604 में तो गुरु अर्जन देव ने आदि ग्रंथ की स्थापना की थी और गुरु ग्रंथ साहिब को तो गुरु गोविंद सिंह ने 1708 में गुरु का दर्जा दिया, में ज़्यादा लोगों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई है. सरकार का रवैया सरकार का भी दोनो आयोजनों के प्रति रवैया अलग रहा है. ख़ालसा त्रिशताब्दी के समय 1999 में सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल, एसजीपीसी, आनंदपुर साहिब फ़ाऊडेशन और सरकारी अफ़सर उससे संबंधित थे. वह एक दम सरकारी कार्यक्रम ही बन कर रह गया था. सरकार ने इसके लिए सौ करोड़ रुपए अलग रखे और खर्चा भी किया. लेकिन गुरु ग्रंथ साहब के 400वें प्रकाश दिवस का आयोजन एसजीपीसी ने किया है और अकाली दल उसकी मदद कर रहा है. लेकिन एसजीपीसी और अकाली दल ने काँग्रेस सरकार से कहा है कि ये पूरी तरह धार्मिक आयोजन हैं और वह इनमें दख़ल न दे. सबक लेकिन इससे क्या सबक मिलता है? सबक यही है कि सत्ता पर बने रहने के लिए उदारवादी राजनैतिक ताकतों को कट्टरपंथी धार्मिक ताकतों के साथ समझौता नहीं करना चाहिए. जब पंजाब में चरमपंथी का दौर था तो यही हुआ था और उदारवादी राजनैतिक ताकतें राजनैतिक परिदृश्य से लगभग गायब हो गई थीं. इस तरह 2004 की राजनीतिक स्थिति अलग है क्योंकि न तो प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व को कोई ख़तरा है और दूसरी ओर काँग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को आगाह किया है कि वे सिखों के धार्मिक मसलों में हस्तक्षेप न करें. |
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