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गुरु ग्रंथ साहिब और आदर्श समाज का सिद्धांत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिख परंपरा के अनुसार ये बात उस समय की है जब सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविन्द सिंह के संघर्षमयी जीवन का अंत निकट आ रहा था. एक दिन उनके परम श्रद्धालुओं में से एक भाई नंदलाल ने उनसे पूछा की उनके बाद गुरु कौन होगा? गुरु गोविन्द सिंह ने उत्तर दिया कि उनके बाद गुरु ग्रंथ ही सिखों के गुरु होंगे. उन्होंने कहा - "आत्मा गुरु ग्रंथ में, शरीर पंथ का, परचा शब्द का, दीदार ख़ालसे का और ओट अकाल की होगी." दसवें गुरु के 'ज्योती जोत समा जाने' के साथ ही देहधारी गुरु की परंपरा समाप्त हो गई. नई प्रथा शब्द गूरु की थी. यह वह ग्रंथ है जिसका संपादन सिखों के पांचवें गुरू अर्जुन देव ने भाई गुरुदास से करवाया था और जिसे 1604 में सिखों के सबसे पवित्र स्थान हरिमंदिर साहेब में स्थापित किया गया. शुरु से ही गुरु अर्जन देव ने गुरु ग्रंथ को अपने से ऊँचा स्थान दिया. सिख पंथ अमृतसर में गुरु ग्रंथ प्रकाश की चौथी शताब्दी मना रहा है. गुरु ग्रंथ साहब की 400वें स्थापना दिवस में शामिल होने के लिए देश-विदेश से लाखों लोगों के शामिल होने का अनुमान है.
गुरु ग्रंथ केवल आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक व सामाजिक मार्गदर्शन भी करता है. यह ग्रंथ बताता है कि शासक कैसा हो - राजा तखति टिकै गुणी, भै पंचाइण रतु।। इसी प्रकार - राजे चुली निआव की। अर्थात राजा को न्याय करने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए. दुनिया में बराबरी के बारे में गुरु ग्रंथ में ऐसा कहा गया है - सभ महि जोति-जोति है सोई। अर्थात सभी जीवों में एक ही परमात्मा है और यही असल साँझ है. मानव द्वारा मानव के शोषण का यह कहकर विरोध किया गया है - जे रतु लगै कपडे जामा होऐ पलीतू। अर्थात जो शोषण करता है उसका दामन भी साफ़ नहीं रहता. आदर्श समाज जानकार मानते हैं कि गुरु ग्रंथ साहब का दृष्टिकोण वैज्ञानिक है. इसके दार्शनिक, सदाचारक तथा धार्मिक पहलू हैं. गुरू ग्रंथ विश्व शांति की बात करता है तथा सभी धर्मों के लोगों को मिलजुल कर रहना सिखाता है. इस ग्रंथ का फ़लसफ़ा जात-पात, ऊँच-नीच और सभी प्रकार के भेद-भाव से ऊपर उठने का है.
इसमें एक आदर्श समाज की स्थापना का संदेश है. सिख गुरूओं ने जिस नए समाज को बनाने का सिद्धांत दिया वह स्थापित समाज के लिए एक चुनौती भी बना. यह ग्रंथ आदर्श शासन व समाज को स्थापित करने और पूरे विश्व में शांति बनाए रखने का मार्ग दर्शाता है. गुरु ग्रंथ की ये विशेषताएँ आध्यात्मिक पहलू के साथ-साथ चलती हैं. सिखों की अपनी अलग पहचान भी ग्रंथ साहब से ही निकली है. इस ग्रंथ का एक ग़ौरतलब पहलू यह है कि इस में केवल गुरुओं के ही वाणी नहीं बल्कि 12वीं से 18वीं सदी तक के भक्तों व सूफ़ी संतों की रचनाएँ भी शामिल हैं. इसमें पहले पाँच सिख गुरुओं और नवें गुरु की वाणी शामिल है. जिस समय गुरु गोविंद सिंह ने इस ग्रंथ को भाई मणि सिंह द्वारा दोबारा तलवंडी साबो में संपादित करवाया, उस समय उन्होंने इसमें अपनी वाणी शामिल नहीं की. गूरु नानक के बाद सभी गुरुओं ने नानक के नाम पर ही वाणी की रचना की. इसमें संत कबीर (उत्तरप्रदेश), रविदास (उत्तरप्रदेश), परमानंद (महाराष्ट्र), नामदेव (महाराष्ट्र), तिरलोचन (महाराष्ट्र), धाना (राजस्थान), बेनी और सैन (उत्तरप्रदेश), भीखन और जयदेव (बंगाल), पीपा (बिहार), रामानंद (उत्तरप्रदेश), साधना (सिंध), सूरदास(अवध), बाबा फरीद (पंजाब), मरदाना (पंजाब), साटाड बलवंद तथा सुंदर (पंजाब) और 11 अन्य भक्तों की रचनाएँ शामिल हैं. यह भक्त सभी जातियों व धर्मों से संबंधित थे. केवल उन्हीं भक्तों की रचनाओं को शामिल किया गया जिनका फ़लसफ़ा गुरू की वाणी के अनुसार थी. गुरु ग्रंथ की वानी 31 पुरातन भक्ती व ग़ैर-भक्ती, सनातन व देसी रागों में रचित है. इस ग्रंथ का एक और बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू यह है की गुरुओं ने वाणी का उच्चारण पंजाबी में किया जो आम आदमी की भाषा थी. गुरुओं ने सिंधी, ब्रज, प्राकृत तथा फ़ारसी आदि में रची रचनाओं को भी इसमें शामिल किया. इस ग्रंथ का मुख्य उद्देश्य ज्ञान के द्वारा आम व्यक्ति के लिए खोलना था. इस ग्रंथ की हरिमंदिर साहब में स्थापना एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत थी. |
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