|
अमृतसर में श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिखों के धार्मिक ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहब के प्रकाश उत्सव के अवसर पर लाखों श्रद्धालुओं ने पंजाब के अमृतसर शहर में एकत्र होना शुरु कर दिया है. चार सौ साल पहले सिखों के पाँचवें गुरु, गुरु अर्जन देव ने गुरु ग्रंथ साहब को अमृतसर में हरिमंदिर साहब में स्थापित किया था. इन दिनों उसी अवसर की याद में श्रद्धालु भारत के विभिन्न राज्यों से तो अमृतसर पहुँचे ही है साथ ही अनेक सिख अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा और अन्य देशों से भी वहाँ पहुँचे हैं. पंजाब की सड़कों पर श्रद्धालुओं को रोक-रोककर सिख रिवायत के अनुसार 'लंगर' खिलाया जा रहा है. सड़कों पर रंगीन पगड़ियाँ पहने पुरुष और सर कपड़े से ढके स्त्रियों को बसों और कारों में या फिर पैदल ही अमृतसर की ओर जाते देखा जा सकता है. ऐसा प्रतीत होता है कि पूरे पंजाब में ही - 'जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल' (जो प्रभु के अनंत होने का नारा लगाता है वह धन्य हो जाता है) का नारा गूँज रहा है. सभी को एक ही मकसद है - हरिमंदिर साहब जाकर गुरु ग्रंथ साहब के दर्शन करना. एक व्यवसायी करतार सिंह का कहना था, "मैं ख़ुद को भाग्यवान मानता हूँ कि मैं इस उत्सव में भाग ले रहा हूँ."
पूरा अमृतसर दुलहन की तरह सजा हुआ है और चारों और ख़ुशी का माहौल है. पुराने शहर के इलाक़े में लगभग सभी जगह लोगों ने घरों और दुकानों पर दीपमाला की है. स्वर्ण मंदिर तो इस तरह सज़ा हुआ जैसा कि दीपावली के समय सजाया जाता है. चारों और दीपमाला की गई है और लाखों लोगों के खाना खाने का इंतज़ाम किया गया है. प्रशासन ने भी पुराने शहर को सँवारने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और न केवल पोताई की गई बल्कि स्वर्ण मंदिर की ओर जाने वाली सभी सड़कों पर नई दरियाँ बिछाई गई हैं. अधिकारियों ने विशेष इंतज़ाम किए हैं और उनका मानना है कि इस अवसर पर अमृतसर आने वालों की संख्या पहले किसी भी समय से ज़्यादा हो सकती है. एक श्रद्धालु हरदीप कौर का कहना था, "गुरु ग्रंथ साहब में जो संदेश है वह मुझे ज़िदगी व्यतीत करने में मदद करता है और मुझे परमात्मा से जोड़ता है." एक अन्य श्रद्धालु डॉक्टर गुरप्रीत सिंह संधू का कहना था, "मैं गुरु ग्रंथ साहिब को इसलिए गुरु मानता हूँ क्योकि इसका संदेश दिव्य है और इस दुनिया के निर्माता से जोड़ता है." इन लोगों का मानना है कि गुरू अर्जन देव की चार सौ वर्ष पूर्व शुरू की गई धार्मिक परंपरा आज भी न केवल जीवंत है बल्कि दुनिया के हर कोने में फैल रही है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||