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सिख विरोधी दंगों में कार्रवाई की माँग | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत सरकार से अनुरोध किया है कि बीस साल पहले सिखों के ख़िलाफ़ हुए सांप्रदायिक दंगों में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ नए सिरे से जाँच कराए और समुचित कार्रवाई करने के लिए सार्वजनिक तौर पर संकल्प ज़ाहिर करे. ग़ौरतलब है कि 31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की उन्हीं के सुरक्षा गार्डों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. हत्या करने वाले गार्ड सिख थे. उनकी हत्या के बाद दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जिनमें कई हज़ार लोग मारे गए थे. मारे गए लोगों में ज़्यादातर सिख थे. एक से चार नवंबर तक सिख समुदाय के प्रतीकों और संपत्तियों को निशाना बनाया गया और बहुत से लोगों को तो ज़िदा जला दिया गया था. अमरीका स्थित इस मानवाधिकार संगठन ने कहा है कि है कि सिखों के ख़िलाफ़ भड़के दंगों में शामिल कुछ लोग अब भी कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं. ह्यूमन राइट्स वॉच के एशिया निदेशक ब्रायन एडम्स ने कहा है कि उन लोगों का रुतबा प्रभावितों को न्याय मिलने में बाधक नहीं बनना चाहिए. उन्होंने कहा, "सरकार के नियुक्त किए गए सात आयोग उस सांप्रदायिक हिंसा की जाँच कर चुके हैं लेकिन ज़्यादातर आयोग या तो सिर्फ़ लीपापोती रहे या फिर उनमें अधिकारियों की तरफ़ से ही रोड़े अटकाए गए." इन सबमें ताज़ा नानावती आयोग की रिपोर्ट एक नवंबर को प्रकाशित होनी थी लेकिन उसे दो महीने के लिए स्थगित कर दिया गया है. ब्रायन एडम्स ने कहा, "जिन आयोगों की रिपोर्ट मुक़दमे चलाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, उनका समय अब पूरा हो चुका है. हिंसा के दो दशक बाद तो पुलिस और अभियोजकों को कार्रवाई करनी ही चाहिए और अब ऐसा करने के लिए काफ़ी सबूत मौजूद हैं." संगठन ने माँग की है कि उस हिंसा में भाग लेने वालों को अब राजनीतिक संरक्षण बंद किया जाना चाहिए. ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि उस हिंसा में शामिल कुछ लोग आज या तो सरकार में किसी ओहदे पर हैं और कुछ सांसद हैं. |
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