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भ्रष्टाचार के आरोप में देऊबा को सज़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नेपाल में भ्रष्टाचार की जाँच के लिए बनाए गए एक शक्तिशाली आयोग ने पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा को भ्रष्टाचार के आरोपों में दो साल जेल की सज़ा सुनाई है. इस आयोग ने देऊबा को अरबों रुपए की एक जल परियोजना में भ्रष्टाचार का दोषी पाया है. पूर्व प्रधानमंत्री देऊबा पर इस सज़ा के अलावा दस लाख अमरीकी डॉलर (90 लाख नेपाली रुपए) का जुर्माना भी लगाया गया है. देऊबा ने इस फ़ैसले को खारिज कर दिया है. उन्होंने कहा, "इस मामले का कोई आधार ही नहीं, यह राजनीतिक हत्या का मामला है और इससे राजनीति से ही निपटा जाएगा." आरोप और सज़ा उल्लेखनीय है देऊबा की सरकार को बर्ख़ास्त करने के बाद नेपाल के राजा ज्ञानेंद्र ने इस पैनल का गठन किया था. नेपाल में बार एसोसिएशन ने इस पैनल का विरोध किया था और कहा था कि चूंकि इस पैनल के पास गिरफ़्तारी, सुनवाई और सज़ा देने जैसे सारे अधिकार हासिल हैंइसलिए इसका राजनीतिक हथियार के रुप में इस्तेमाल हो सकता है. रॉयल कमीशन ऑन करप्शन कंट्रोल (आरसीसीसी) नाम के इस पैनल ने जल परियोजना की जाँच की. इसके बारे में आरोप था कि कथित रूप से इस परियोजना का ठेका एक ऐसे ठेकेदार को दे दिया गया जो इसकी पात्रता नहीं रखता था. आरोप है कि इसकी वजह से परियोजना की लागत पचास लाख डॉलर बढ़ गई. शेर बहादुर देऊबा को राजा ज्ञानेंद्र ने छह महीने पहले, फ़रवरी-2005 में ही प्रधानमंत्री पद से बर्ख़ास्त किया था. आरसीसीसी ने पूर्व प्रधानमंत्री देऊबा के अलावा एक पूर्व मंत्री प्रकाश मानसिंह और चार अन्य लोगों को दोषी ठहराया है. देऊबा और मानसिंह दोनों पिछले तीन महीनों से नज़रबंद थे और दोनों ने आरसीसीसी के सामने पेश होने से इनकार कर दिया था और अपने लिए बचाव के लिए वकील भी नहीं रखा था. बीबीसी के काठमांडू संवाददाता चार्ल्स हैवीलैंड का कहना है कि देऊबा के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील का रास्ता बचा है और संभावना है कि वे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील भी करेंगे. |
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