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'प्रधान-पति' के साए से बाहर आती महिलाएँ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
टिहरी के भोपालपानी गाँव की प्रधान शांति देवी की दिनचर्या आज से दो साल पहले किसी दूसरी पहाड़ी महिला की ही तरह थी. सुबह उठकर हँसिया और रस्सी लेकर वे पहाड़ों पर मीलों की चढ़ाई चढ़कर मवेशियों के लिए चारा और घर के लिए ईंधन लाती, फिर खेत में फसल की गुड़ाई और घर लौटकर परिवार के लिए खाने का प्रबंध करतीं. परिवार के पुरुष शराब में डूबे रहते. लेकिन जब वे प्रधान बनीं तो उन्होंने शराब के ठेकों के ख़िलाफ़ मुहिम ही छेड़ दी. आज इस मुहिम में सारा गाँव उनके साथ है और शराब के ठेके की दुकान पर ताला लग चुका है. यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है. पिछले सात सालों में उत्तरांचल में कई महिला प्रतिनिधियों ने “प्रधान पति” के साए से बाहर आकर अपना रास्ता बनाया है जो बाक़ी के लिए मिसाल है. 'बुआरियाँ चामारंगी पंचायतें', 'औरतें क्या पगड़ी बाँधकर बैठेंगी चौपाल पर', 'वो क्या काम करेंगी, काम करेगा उसका पति'. छींटाकशी के ऐसे ज़ुमलों का सामना शुरू में लगभग हर उस महिला को करना पड़ा जो पंचायतों में चुनकर आईं. महिला आरिक्षत सीटों पर “कठपुतलियों” को खड़ा कर दिया जाता और असली बागडोर परिवार के पुरुषों के हाथ में ही रही और अधिकांश मामलों में महिलाओं की भूमिका घूंघट में रहकर अंगूठा लगाने की ही रही और एक नया पद ही बन गया “सरपंच पति” या “प्रधान पति” का. लेकिन वे अब इस साए से बाहर आ रही हैं. कड़ा रुख़ रूद्रप्रयाग जिला पंचायत अध्यक्ष शैलारानी रावत ने नौकरशाही के भ्रष्ट आचरण का कड़ा विरोध किया और पंचायत समिति के कुछ सदस्यों के कमीशन लेने के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गईं. झूठे मामले में उन्हें फंसाने पर उन्होंने अपनी जमानत लेने से इनकार कर दिया. हारकर पंचायत समिति के सदस्यों को अपनी गलती माननी पड़ी. देहरादून जिले के कालसी ब्लॉक की सदस्य शारदा चौहान की कहानी ये है कि उन्होंने सभी महिला सदस्यों को इकट्ठा कर पंचायत की बैठक में “प्रधान पति” को घुसने नहीं दिया. आखिरकार हारकर उस व्यक्ति को अपनी पत्नी को बैठक की अध्यक्षता के लिए भेजना ही पड़ा. ये कुछ उदाहरण भर हैं. इसके अलावा स्कूल खुलवाना, सड़क बनवाना, वन संरक्षण के अनेक काम निर्वाचित महिलाओं के खाते में दर्ज हैं जो उन्होंने अपने-अपने इलाकों की खुशहाली के लिए किए हैं. लेकिन उनके रास्ते अभी भी आसान नहीं हुए हैं और राजनीति की कठिन डगर पर हर कदम अभी भी चुनौतियाँ उनका इंतजार कर रही हैं. आँखें खोलने वाले अनुभव राजधानी देहरादून में उत्तरांचल की पंचायती राज संस्थाओं की लगभग 650 प्रतिनिधियों ने जब अपने खट्टे मीठे अनुभव बाँटे तो सबकी आँखें और खुलीं. ये एक खुला मंच था, एक अनूठा संगम. जहाँ पिथौरागढ़ से लेकर टिहरी गढ़वाल के दूर दराज के इलाके से आई महिलाओं ने पंचायतों को और अधिक अधिकार संपन्न बनाने की माँग की और कहा कि स्थानीय विकास और उसके उपयोग में उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए. सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए चकराता ब्लॉक थंटा गाँव की पंचायत सदस्य लक्ष्मी कहती हैं “गाँव में तैनात अफ़सर शासनादेश को अमल में लाते ही नहीं. जहाँ सरकार को छह सुमति देवी ने सवाल उठाया कि “उत्तरांचल में वन पंचायतों का गठन कर सरकार एक समांनांतर व्यवस्था क्यों खड़ी कर रही है.” फकोट से आई सुशीला देवी की शिकायत थी कि “ग्राम प्रधान महिला सदस्यों को गंभीरता से लेते हीं नहीं, न उन्हें बैठक की सूचना दी जाती है और न ही विकास योजनाओं की जानकारी.” उत्तरांचल देश का संभवतः एकमात्र राज्य है जहाँ पंचायत संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 45 प्रतिशत है जो कि 33 प्रतिशत के तय आरक्षण से कहीं ज़्यादा है. |
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