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रविवार, 07 नवंबर, 2004 को 08:08 GMT तक के समाचार
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अब महिलाएँ चला रही हैं टैक्सी

महिला टैक्सी ड्राइवर
एक स्वयंसेवी संस्था ने उनको प्रशिक्षित करने की व्यवस्था की है
अगली बार टैक्सी बुलाने पर अगर आसमानी रंग की कमीज़, काली पैंट और जूते पहने महिलाएँ टैक्सी चलाती नज़र आएँ, तो चौंकिएगा नहीं.

भारत की राजधानी दिल्ली के 'मेगा कैब सर्विस' ने देश में पहली बार महिलाओं को टैक्सी चलाकर रोज़गार कमाने का मौक़ा दिया है.

मेगा कैब के साथ काम कर रही सभी महिलाओं ने गाड़ी चलाने की शिक्षा और तकनीकी प्रशिक्षण आईटीडीआर (इंस्टीट्यूट ऑफ़ ट्रेनिंग, ड्राइविंग और रिसर्च) से लिया है. साथ ही साथ दुर्घटना की स्थिति में उपयोगी प्राथमिक उपचार और आत्मरक्षा के लिए कराटे भी सीख रखा है.

महिलाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करने और नौकरी दिलाने में 'इंडिया स्पॉन्सर फाउंडेशन' का बहुत बड़ा योगदान है.

अभी महिला टैक्सी चालकों का प्रशिक्षण काल चल रहा है, जिसमें कंपनी वाले उन्हें ढाई हज़ार रूपए महीना मेहनताना देते हैं और पीएफ़ यानी प्रॉविडेंट फ़ंड भी काटा जाता है.

जहाँ तक घरवालों के सहयोग और सहमति की बात है, वहाँ कंपनी वाले नियुक्ति के समय ही घरवालों से यह लिखित रूप से ले लेते हैं कि इससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं.'

आत्मविश्वास

टैक्सी चालक अनुराधा का कहना है, ''मैं इस नौकरी से बहुत ख़ुश हूँ. पहले मैं कहीं अकेली नहीं जा पाती थी. पर नौकरी करने के बाद अकेली जाती भी हूँ और लोगों को पहुँचाती भी हूँ. इससे मेरा आत्मविश्वास दोगुना हो गया है. पति की घर चलाने में मदद भी हो जाती है और बच्चे इसलिए ख़ुश हैं कि उनकी मम्मी पैंट-कमीज़ पहनती हैं और गाड़ी भी चलाती हैं.''

 ''मैं इस नौकरी से बहुत ख़ुश हूँ. पहले मैं कहीं अकेली नहीं जा पाती थी. पर नौकरी करने के बाद अकेली जाती भी हूँ और लोगों को पहुँचाती भी हूँ. इससे मेरा आत्मविश्वास दोगुना हो गया है. पति की घर चलाने में मदद भी हो जाती है और बच्चे इसलिए ख़ुश हैं कि उनकी मम्मी पैंट-कमीज़ पहनती हैं और गाड़ी भी चलाती हैं
अनुराधा, टैक्सी ड्राइवर

अभी तक वाहन चालक के रूप में पुरूष रूप ही उभरकर आता था, ख़ासकर टैक्सी, बस और ट्रक इत्यादि चलाने के क्षेत्र में पुरूषों का ही वर्चस्व था, पर आज महिलाओं ने इस क्षेत्र में क़दम रख अपने साहस का परिचय दिया है, पर उनकी चुनौतियाँ भी कुछ कम नहीं हैं. सड़क पर, पार्किंग में हर जगह पुरूषों की छींटाकशी का सामना करना पड़ता है. कैसे निपटती हैं यह महिला ड्राइवर इन परेशानियों से?

ड्राइवर सोमलता इसके जवाब में कहती हैं, ''कई लोग इस बात से परेशान हैं कि उनका रोज़गार हमारे हाथ आ गया है. इसी बात से घबराकर वह व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि अच्छा! अब औरतें यह भी करेंगी'? पर हम इन बातो पर ध्यान नहीं देते और अपने कान बन्द रख, चुपचाप अपना काम करते रहते हैं.''

सोमलता ने कभी सोचा भी नहीं था कि वह टैक्सी चलाएंगी. वह तो एक दिन बस अपनी छोटी-बेटी को कराटे सिखाने लेकर गई थी जहाँ एक दिल्ली पुलिस कार्यकर्ता ने उसे भी कराटे सीखने और बाद में ड्राइविंग सीखने को प्रेरित किया, और बन गई सोमलता टैक्सी ड्राइवर.

पर दिल्ली जैसे महानगर में जहाँ हर दिन महिलाओं की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगता है, ऐसे में अपने को कितना सुरक्षित महसूस करती हैं ये नई टैक्सी ड्राइवर? इस सवाल पर गीता कहती हैं, ''डर तो लगता है, कभी किसी से रास्ता पूछते हैं, तो लोग लिफ़्ट माँगने लगते हैं, ऐसे में हम मना करके निकल जाते हैं. इसलिए हर जगह गाड़ी रोक भी नहीं सकते, गाड़ी हरदम लॉक करके और खिड़की के शीशे चढ़ाकर चलाते हैं.''

सुविधाएँ

यह तो रही ड्राइवरों की समझ, पर अपनी महिला ड्राइवरों के लिए क्या ख़ास इंतज़ाम हैं ग्रेटर कैलाश की कंपनी मेगा कैब सर्विस के कार्यक्रम संयोजक लाम्बा बताते हैं कि महिलाएँ हफ़्ते में छः दिन काम पर आती हैं. ड्यूटी सुबह दस बजे से शाम सात बजे तक होती है. हर टैक्सी में वॉकी-टॉकी है, जिससे सीधी नियंत्रण कक्ष में बात की जा सकती है.

महिला टैक्सी ड्राइवर
उन्हें कार चलाने के अलावा आत्मरक्षा के लिए कराटे का भी प्रशिक्षण दिया गया है

वे बताते हैं, "गाड़ी बिगड़ने पर या टायर पंक्चर होने पर, वैसे तो यह महिलाएँ ख़ुद गाड़ी ठीक करने में सक्षम हैं, पर ज़्यादा ख़राबी होने पर तुरंत दूसरा ड्राइवर वहाँ भेजा जाता है जहाँ गाड़ी ख़राब है और महिला चालक को मदद पहुँचाई जाती है.''

और जो लोग टैक्सी में सफ़र करते हैं, उनके साथ यह महिलाएँ सुरक्षित हैं? क्या इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि महिला चालक की गाड़ी में कौन सफ़र करेगा?

इस पर लाम्बा ने कहा, ''चूंकि हमारी टैक्सी फोन पर बुक की जाती है, इसलिए ग्राहक को जाँचना मुश्किल होता है. पर सभी महिला चालक स्वयं अपनी रक्षा कर सकती हैं, और बिल इत्यादि के मामले में भी काफ़ी सावधानी बरतती हैं.''

यात्रियों के अनुभव

महिला टैक्सी ड्राइवरों के साथ सफ़र कर चुकीं श्रेया यादव कहती हैं, ''यह जानकर अच्छा लगा कि अब लड़कियाँ भी टैक्सी चलाती हैं. अब से मुझे महिला ड्राइवर चाहिए क्योंकि मैं उनके साथ ख़ुद को ज़्यादा सहज महसूस करती हूँ.''

 ''यह जानकर अच्छा लगा कि अब लड़कियाँ भी टैक्सी चलाती हैं. अब से मुझे महिला ड्राइवर चाहिए क्योंकि मैं उनके साथ ख़ुद को ज़्यादा सहज महसूस करती हूँ
श्रेया यादव

बहुत से परिवार महिला ड्राइवर इसलिए चाहते हैं क्योंकि उनके घर में बहू और बेटियाँ हैं और कई इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि महिलाएँ पुरूषों के बजाय अच्छी गाड़ी चलाती हैं.

मेगा कैब के लिए काम कर रही महिलाएँ दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में फिएट, सिएना, मारूति, बलेनो, मित्सुबिशी लांसर और सिएलो जैसी गाड़ियाँ चलाती हैं.

अभी इस कंपनी के साथ नौ महिलाएँ बतौर टैक्सी ड्राइवर काम कर रही हैं. भविष्य में और महिला ड्राइवरों की नियुक्त करने की योजना है पर केवल, उन्हीं महिलाओं को नौकरी दी जाएगी जो ''इंडिया स्पांन्सर'' द्वारा लाई जाएंगी.

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