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बहादुरी की मिसाल हैं निर्मला | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बहादुरी के किस्से तो आप ख़ूब सुनते होंगे और रोमांच पैदा करनेवाली फ़िल्मों को भी बड़े मज़े से देखते होंगे लेकिन आज आप निर्मला देवी से मिलिए जो कोई काल्पनिक कथा या फ़िल्म नहीं, बल्कि बहादुरी की एक जीती-जागती मिसाल हैं. ऐसी मुलाक़ात तब और भी रोचक हो जाती है जब बहादुरी का कारनामा किसी ऐसी महिला ने कर दिखाया हो, जो किसी गाँव की अपनी सीमाओं में रहनेवाली हो और ऐसा कुछ करना उसके लिए एक आश्चर्य से कम न हो. निर्मला, हिमांचल के मण्डी ज़िले के पिपली गाँव की रहनेवाली हैं. घटना बात अप्रैल, 2003 की है. अभी सूरज पूरी तरह से ढला नहीं था और गाँव के लोग अपने खेतों में काम निपटाकर वापस लौट रहे थे. खेतों में कुछ बच्चे खेल रहे थे और पास में ही निर्मला घास काट रही थीं. इतने में वहाँ एक आदमखोर तेंदुआ आ पहुँचा और खेत में खेल रहे एक बच्चे पर टूट पड़ा. निर्मला के आसपास कोई भी बड़ा आदमी नहीं था लेकिन अपनी जान की परवाह किए बग़ैर ही वो घास काटनेवाला हसिया लेकर उस आदमख़ोर जानवर की ओर लपकी. निर्मला ने किसी तरह से उसका ध्यान बच्चे से हटाया और ख़ुद तेंदुए पर झपटीं. करो या मरो तेंदुए ने पहले ही वार में उसे बुरी तरह से घायल कर दिया. अपने को बचाने के लिए भागने के बजाय निर्मला ने अपने हसिए से तेंदुए पर हमला बोल दिया. इस लड़ाई में दोनों बुरी तरह से लहूलुहान हो गए. तेंदुए ने निर्मला के दाएं कंधे की हड्डी और पीठ का कुछ हिस्सा खा लिया. बुरी तरह से घायल निर्मला ने हिम्मत नहीं छोड़ी और लगातार वार करके तेंदुए को मार दिया. खेत में दोनों ही पड़े थे, मरा हुआ तेंदुआ और बेहोश, लहूलुहान निर्मला. इस घटना के आधे घंटे बाद तक गाँव का कोई भी आदमी निर्मला की सुध लेने नहीं आया. आधे घंटे के बाद गाँव के लोगों ने डरते हुए पेड़ों पर चढ़कर उनको देखा. निर्मला बताती हैं, “गाँव के लोग कह रहे थे कि निर्मला तो मर गई है और तेंदुआ उसका खून पीकर मस्त पड़ा है.” कुछ तो सीखो इसपर निर्मला ने उन्हें आवाज़ दी कि डरने की ज़रूरत नहीं है. तेंदुआ मर चुका है और वो अभी ज़िंदा हैं. लोगों को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ तो निर्मला ने घायल अवस्था में ही कुछ दूर चलकर दिखाया और फिर बेहोश होकर गिर पड़ीं. लोगों ने इसके बाद उन्हें एक चारपाई में डाला और पास के अस्पताल में ले गए. वो बताती हैं, “तेंदुआ आदमख़ोर था और उस बच्चे के बाद वो बाकी लोगों पर भी हमला कर सकता था.” निर्मला बताती हैं कि उस वक्त उन्हें कुछ भी नहीं सूझ रहा था. बस इतना समझ में आ रहा था कि या तो यह तेंदुआ ज़िंदा रहेगा और या फिर वो. बेशक, निर्मला का यह कारनामा कितनों के लिए ही मिसाल और किसी हैरतअंगेज़ कारनामे से कम नहीं है. निर्मला को हिमाचल प्रदेश की सरकार ने जीवन रक्षा पदक से सम्मानित किया है और राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों उन्हें एक वीरता पुरस्कार देने वाली संस्था ने स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया है. |
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