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'जिन्ना सिर्फ़ 1937 तक सेक्युलर थे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जिन्ना साहब के राजनीतिक जीवन को दो हिस्सों में बाँटकर देखना होगा, 1937 से पहले और 1937 के बाद. 1937 के पहले तक वे बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे, हिंदू-मुस्लिम एकता के बड़े हामी थे, लेकिन 1937 के बाद उनकी राजनीति की धारा बदल गई और वे मुसलमानों के नेता बन गए. ये जो कहा जाता है कि सरोजिनी नायडू ने उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत कहा था, वह बिल्कुल सही है, लेकिन सरोजिनी नायडू ने सिर्फ़ यह बात दोहराई थी, यह बात सबसे पहले गोपाल कृष्ण गोखले ने कही थी जो जिन्ना को बहुत मानते थे. शुरूआत यहाँ से हुई कि जिन्ना और गाँधी जी के मतभेद सामने आए, जिन्ना इस बात से सहमत नहीं थे कि राजनीति और धर्म को अलग रखना चाहिए, जिन्ना का मानना था कि गाँधी की राजनीति देश के लिए ठीक नहीं है. लेकिन जिन्ना शुरूआती वर्षों में पूरी तरह से सेक्युलर नेता थे इसीलिए मतभेद बढ़ने के बाद कांग्रेस से अलग होकर भी वे भारत की आज़ादी के लिए लड़ते रहे, लेकिन उनकी लड़ाई का तरीक़ा अलग था. वे जेल जाने, धरना देने और प्रदर्शन करने में यक़ीन नहीं रखते थे बल्कि वे दिमाग़ से एक वकील थे और क़ानूनी दाँव-पेंच ही उनके हथियार थे. 1913 में वे जब मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने तब भी उनकी कोशिश थी कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग मिलकर चलें, उसमें वे कुछ समय तक, एक हद तक कामयाब भी रहे. बदलाव जिन्ना जैसे-जैसे कांग्रेस की राजनीति में शामिल होते गए उन्हें यह लगने लगा कि हिंदू बहुल आज़ाद भारत में मुसलमानों के साथ अच्छा बर्ताव नहीं होगा, शायद उनके साथ ज़्यादती भी हो.
यही वजह है कि जिन्ना चाहते थे कि कोई ऐसा समझौता हो जाए कि 'पावर शेयरिंग' में मुसलमानों का भी अच्छा-ख़ासा हिस्सा हो, इसके लिए उन्होंने 14सूत्री फ़ार्मूला सामने रखा, कांग्रेस के सामने दूसरे कई प्रस्ताव रखे. इस सिलसिले में कलकत्ता में एक राष्ट्रीय अधिवेशन भी हुआ जिसमें उन्होंने अपनी इस राय का इज़हार किया लेकिन उनकी बात कुछ चली नहीं है क्योंकि तब तक कांग्रेस पर हिंदू महासभा की लीडरशिप का भी अच्छा-ख़ासा असर हो चुका था. राजनीति से उकताकर जिन्ना साहब लंदन लौट गए और वहाँ वकालत करने लगे. कुछ वर्षों की वकालत के बाद वे 1934-35 में भारत लौटे. उनके लौटने पर भारत के मुसलमान नेताओं ने उन्हें मजबूर कर दिया कि वे मुस्लिम लीग की ओर से भारत के मुसलमानों का नेतृत्व करें, अगले कुछ वर्षों में उन्होंने मुस्लिम लीग में दोबारा जान फूँकी. उन्होंने कांग्रेस से दोबारा से बातचीत शुरू की, गाँधी जी से नेहरू जी से कई बैठकें हुईं, वे सुभाष चंद्र बोस से भी मिले लेकिन आख़िर में इस नतीजे पर पहुँचे कि बँटवारा ही एकमात्र रास्ता है. लाहौर घोषणा इसके बाद जिन्ना ने 1940 में लाहौर डिक्लेरेन पेश किया जिसमें अलग पाकिस्तान की माँग उठाई गई. अब पाकिस्तान हासिल करने के लिए उन्होंने सेक्युलरिज़्म या नेशनललिज़्म का चोगा उतार फेंका और कम्युनलिज़्म या सांप्रदायिकता का लिबास ओढ़ लिया. इस्लाम को ख़तरे में कहकर उन्होंने मुसलमानों को गोलबंद करना शुरू किया. एक ऐसा मुसलमान जो सिर्फ़ नाम का मुसलमान था उसने धार्मिक उन्माद के ज़रिए मुसलमानों को इकट्ठा करना शुरू किया, प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना मौदूदी ने तो यहाँ तक कहा था कि जिन्ना को इस्लाम का एक क़तरा भी नहीं पता. जिन्ना ने मुसलमानों को समझाना शुरू किया कि हिंदुओं से अलग हुए बिना उनका भला नहीं हो सकता, उन्होंने 'टू नेशन थ्योरी' दी, जिससे बहुत हिंदू-मुसलमान रिश्तों पर बहुत बुरा असर पड़ा. (राजेश प्रियदर्शी से बातचीत पर आधारित) रफ़ीक़ ज़कारिया ने कई किताबें लिखी हैं जिनमें मोहम्मद अली जिन्ना पर लिखी किताब लिखी 'मैन हू डिवाइडेड इंडिया' शामिल है. |
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