BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
सोमवार, 18 अप्रैल, 2005 को 13:01 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
बहुत कुछ बदल गया है

मुशर्रफ़ और मनमोहन सिंह
आगरा की शिखर बैठक असफल रही थी
नाश्ता करते हुए जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा कि एक टेलीविजन चैनल की हेडलाइन थी -फिर वही दिल लाया हूँ- जबकि उनके शब्दों में यह ग़लत है. उनका कहना था कि वे वो दिल नहीं बल्कि नया दिल लाए हैं.

इसके जवाब में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि न तो वे दिलों को पढ़ना जानते हैं और न ही वो ज्योतिषी हैं.

लेकिन दोनों शीर्ष नेताओं की बातचीत से स्पष्ट था कि काफ़ी कुछ बदल गया है.

एक मुलाक़ात की तुलना किसी न किसी अन्य मुलाक़ात से करना पेशेवर पत्रकारों का फ़र्ज़ है- भले ही आगरा को हुए चार वर्ष हो गए हों.

इस बीच सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन रहा है 11 सितंबर के बाद पाकिस्तान के संदर्भ, वातावरण और बहुत हद तक दक्षिण एशिया का बदलना.

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की पत्रकारों से बातचीत पिछली बार की ही तरह सीधे टीवी पर प्रसारित हुई. वहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की संपादकों से बातचीत बिलकुल उसी कमरे तक सीमित रही- हम जो वहाँ उपस्थित थे उसे रिपोर्ट कर सकते हैं- लेकिन दूर-दूर तक कैमरा नहीं.

वैसे भी डॉ मनमोहन सिंह और जनरल मुशर्रफ़ के व्यक्तित्व के तरह ही दोनों सरकारों के दावे और काम करने के ढंग में अंतर बिलकुल स्पष्ट दिखा.

बदली दृष्टि

एक समय में पाकिस्तान में विश्वास बढ़ाने वाले प्रस्तावों के प्रति अविश्वास का माहौल था. उसे विश्वास बढ़ाने वाले कदमों का जाल बताया जाता था.

लेकिन ऐसा लगता है कि पाकिस्तानी नेतृत्व का श्रीनगर-मुजफ्फराबाद बस और आम लोगों की आवाजाही से उत्पन्न उत्साह को देखकर मन बदला है- और अब एक ओर की जनता का दूसरी ओर की जनता से संपर्क को मरहम के रुप में देखा जा रहा है.

और इस पूरे प्रयास को पलट सकने वाली प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है.

पिछले कुछ वर्षों में भारत की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और विश्व में भूमिका के प्रति पाकिस्तान का रवैया रहा है समझौते का यह प्रक्रिया एक दिन में नहीं हुआ है. पिछले सार्क शिखर सम्मेलन में ही आर्थिक संबंधों को दी गई तरजीह से यह परिवर्तन स्पष्ट है.

अमरीका-चीन का प्रभाव

दोनों देशों में अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री हैं और आर्थिक संबंधों के महत्त्व का दोनों को एहसास है.

वेन जिया बाओ और नटवर सिंह
इस महीने के शुरुआत में ही चीनी नेता दिल्ली आए थे

अमरीका का प्रभाव इस क्षेत्र पर भी स्पष्ट है. और न सिर्फ़ पाकिस्तान, बल्कि भारत को भी इसका एहसास है.

भारत के विदेश मंत्री अमरीका से अभी लौटे हैं और राष्ट्रपति बुश ने लगभग स्पष्ट कर दिया है कि वह इस क्षेत्र में गतिविधियों को ग़ौर से देख रहे हैं.

और शायद एक और महत्वपूर्ण चीज़ इस समीकरण में रही हैं चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की हाल ही की बहुत सफल भारत यात्रा.

एक समय में चीन को पाकिस्तान के मित्र के रूप में देखा जाता था और भारत मानों 1962 के बोझ को 21वीं सदी में ले गया था.

लेकिन भारत-चीन नियंत्रण रेखा की समस्या का जिस प्रकार निपटारा किया जा रहा है. जिस प्रकार दो प्राचीन एशियाई सभ्यताएँ अपने आपको 21वीं सदी के सत्य में ढल रही हैं- यह कहना ग़लत नहीं होगा कि इसका भी असर भारत और पाकिस्तान के बीच इस प्रक्रिया पर हुआ है.

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>