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स्लीमनाबाद का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पहली नज़र में स्लीमनाबाद में ख़ास कुछ भी नहीं. वहीं चाय पान की दुकानों पर गप्पे हांकते लोग, सड़क पर तेज़ रफ़्तार से पास करते हुए ट्रक और बसें और ज़रूरत का सामान बेचती दुकानें. लेकिन अगर आप इस क़स्बे को जानना चाहते हैं तो आपको इसके पुलिस थाने का चक्कर लगाना पड़ेगा क्यों कि इस क़स्बे का इतिहास यहीं से शुरू होता है. क़रीब डेढ सौ साल से भी पहले. लेकिन तब यहाँ जंगलों का राज था. स्लीमनाबाद थाने के पुलिस अधिकारी देवेश कुमार पाठक बताते हैं, "उस समय यह क्षेत्र जंगलों से भरा था. लेकिन एक राजमार्ग यहीं से गुज़रता था जिससे हो कर दक्षिण और मध्य भारत के तमाम यात्री उत्तर भारत की ओर जाते थे. इस क्षेत्र में बसे ठग और पिंडारी अक्सर उन्हें लूट लेते थे और कई लोगों की हत्या भी कर देते थे." मध्य भारत में प्रकोप की तरह फैले- रुमाल में सिक्कों की गांठ लगा कर रुपये-पैसे और धन के लिए निरीह यात्रियों के सिर पर चोट करके लूटने वाले ठग और पिंडारियों का आतंक 19वीं सदी के प्रारंभ तक इतना बढ़ गया कि ब्रिटिश सरकार को इसके लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ी. ठगी प्रथा के कारण मुग़ल काल में नागपुर से उत्तर प्रदेश के शहर मिर्ज़ापुर तक बनी इस सड़क पर यात्रियों का चलना मुश्किल हो गया था. स्थानीय पत्रकार राजाराम अग्रहरी कहते हैं कि इस समस्या के उन्मूलन के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक विशेष पुलिस दस्ता तैयार किया जिसकी कमान कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन को सौंपी गयी. उन्होंने जबलपुर में अपनी छावनी स्थापित की और एक दस्ता इसी जगह छोड़ा जो आज स्लीमनाबाद कहलाता है. स्लीमन की याद में राजाराम अग्रहरी की इन बातों के कई गवाह हैं. पुलिस स्टेशन के कमरे में लगा वो बड़ा सा बोर्ड जिस पर ठगी प्रथा और स्लीमनाबाद का इतिहास दर्ज है.
थाने के परिसर में बना चार कोनों वाला ऊँचा स्मारक कर्नल स्लीमन की जीवनगाथा के सारांश के साथ या फिर चारदीवारी से सटा पीपल का विशाल वृक्ष-कहा जाता है कि इसी पर ठगों को लटका कर फाँसी दी जाती थी. लेकिन बात शायद इतने पर ही ख़त्म हो जाती तो स्लीमनाबाद वाले कर्नल स्लीमन को अब भी याद नहीं करते और ना ही उनके रिश्तेदारों के आगमन की ख़बर रखते. गांव के बुज़ुर्ग सुखलाल ने बताया कि स्लीमन साहेब के पोते और परपोते अभी भी यहाँ आते हैं और इस वसंत पंचमी के कुछ ही दिनों पहले भी वो यहां आए थे. इंग्लैंड के स्ट्रेटसन में जन्मे ईसाई धर्मानुयायी कर्नल स्लीमन को पास ही बसे कोहका के एक हिंदू स्थल पर औलाद की मन्नत मांगने जाना पड़ा. बाद में उन्होंने 96 एकड़ ज़मीन ख़रीद कर स्लीमनाबाद बसाया जो आज भी मौजूद है. |
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