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शुक्रवार, 04 फ़रवरी, 2005 को 11:22 GMT तक के समाचार
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श्रीलंका की समस्या और भारत का भविष्य

एलटीटीई के सैनिक
श्रीलंका सेना के अधिकारी कहते हैं कि भारत के वामपंथी चरमपंथियों का एलटीटीई से सीधा संपर्क है
भूटान शायद दक्षिण एशिया में अकेला देश है जहाँ भारत का नीला पासपोर्ट दिखाने पर आपको ख़ास सहुलियतें मिलती हैं और पाकिस्तान के बाद एलटीटीई का चेकपोस्ट शायद ऐसी दूसरी जगह है जहाँ आपको इसी पासपोर्ट की बदौलत शक की नज़र से देखा जाता है.

पाकिस्तान की ही तरह एलटीटीई के चेक पोस्ट पर जहाँ मेरे ब्रिटिश साथी आराम से पार निकल गए, मुझे भारतीय होने के कारण ख़ासी मशक्कत करनी पड़ी.

मुझे खास भारतीयों के लिए बनाए गए फॉर्म भड़ने पड़े. एलटीटीई के कैडरों के इंटरव्यू से गुज़रना पड़ा, जो किसी भी गैर भारतीय के लिए ज़रूरी नहीं था.

मुझे इन सबसे गुज़रते वक़्त श्रीलंकाई सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी की वो बात याद आई, जो पिछली रात उन्होंने मुझसे कही थी, "हम चाहते हैं कि भारत एक सशक्त देश बने इसलिए हम एलटीटीई से निपटने में हमारे अनुभव आपसे बाँटना चाहते हैं. आप सीख सकते हैं कि हम उनसे कैसे लड़ रहे हैं जिसे आप लोगो ने भी कभी बनने में मदद की थी और जिनसे आप भी प्रताड़ित हो चुके हैं."

मैंने एमआर नारायणस्वामी की क़िताब पढ़ रखी थी जिसमें उन्होंने विस्तार से लिखा था कि एलटीटीई के कैडरों को भारतीय सेना ने किस तरह देहरादून के पास 80 के दशक में प्रशिक्षित किया था. जिससे मुझे समझ में आया कि श्रीलंकाई अधिकारी एलटीटीई को भारत की मदद के बारे में क्या कहना चाह रहे हैं.

भारत जैसी समस्या

श्रीलंका में लोग कहते हैं कि श्रीलंका जैसी समस्या भारत को भी भविष्य में झेलनी पड़ सकती है.

श्रीलंका के लोग
श्रीलंका के लोग मानते हैं कि उनकी और भारत की समस्या एक जैसी हो सकती है

इसे समझाने के लिए वे कहते हैं कि भारत और श्रीलंका एक दूसरे के बिलकुल उलट हैं. वे कहते हैं कि दक्षिणी श्रीलंका में रहने वाले सिंहली दरअसल उत्तर भारत से आए और उनका बौद्ध धर्म तो उत्तर भारतीय है ही और तमिल दक्षिण भारत से आए.

यानी उत्तर भारतीय श्रीलंका के दक्षिण में रहते हैं और दक्षिण भारतीय उत्तर में.

वे मानते हैं कि भारत में भी उत्तर और दक्षिण भारत के बीच मतभेद हैं जो आज नहीं तो दस-पंद्रह साल बाद उभर जाएँगे.

वे यह भी याद दिलाते हैं कि भारत में सबसे पहले अलगाववाद दक्षिण में तमिल इलाके में ही शुरू हुआ. यह अलग बात है कि उसे संभाल लिया गया.

गुलाबी पट्टा

एलटीटीई के चेक पोस्ट में पहुँचने से पहले श्रीलंकाई सेना के चेक पोस्ट पर मैंने तमाम श्रीलंकाई सैनिकों को अपने कलाई पर गुलाबी पट्टा लगाए हुए देखा.

जब मैंने उसके बारे में पूछा तो मुझे बताया गया कि श्रीलंकाई सैनिकों की एलटीटीई से पहचान करने के लिए यह ख़ास पट्टा हर श्रीलंकाई सैनिक अपनी कलाई पर पहनता है. और हर रोज़ यह किसी खास वक़्त पर इस पट्टे का रंग बदल दिया जाता है और इसकी जानकारी सिर्फ सैनिकों को ही हो सकती है.

वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि एलटीटीई के लोग श्रीलंकाई सैनिक की वर्दी में आकर हमला न कर दें.

उसी दिन मुझे उत्तर पूर्व भारत से एक खबर पढ़ने को मिली थी कि एक भारतीय ब्रिगेडियर को भारतीय सैनिकों ने ही उग्रवादी समझकर मारा डाला.

मुझे लगा कि भारतीय सेना श्रीलंका की सेना से कुछ ज़रूर सीख सकती है.

 हमें यह भी पता है कि आपके वामपंथी चरमपंथियों का एलटीटीई से सीधा संबंध है और हम आपको हमारे उन अनुभवों के बारे में बताना चाहते हैं जिससे हम जूझ रहे हैं और आपके माओवादियों तक ये तकनीके जल्दी ही पहुँचने वाली हैं. अमरीकी तो हमसे जानना चाहते हैं कि हम आतंकवाद से कैसे निपट रहे हैं लेकिन आपको शायद आश्चर्य हो कि एक भी भारतीय सैनिक ने हमसे एक भी सवाल नहीं पूछा है
श्रीलंकाई सैन्य अधिकारी

श्रीलंकाई अधिकारियों ने एक मुलाक़ात में मुझसे कहा था, "आप समझते हैं कि अमरीकी मैरीन के सैनिक सुनामी के बाद यहाँ सिर्फ मदद करने आए हैं? हमें पता है कि उनके दल में सीआईए के लोग हैं. उनके फारवर्ड प्लानर है, और वे रोज़ आकर सैकड़ों सवाल पूछ रहे हैं. वे समझना चाहते हैं कि हम आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई कैसे लड़ रहे हैं. आखिरकार एलटीटीई दुनिया में आत्मघाती बम का जनक है."

उस श्रीलंकाई सैन्य अधिकारी ने मुझसे कहा, "हमें यह भी पता है कि आपके वामपंथी चरमपंथियों का एलटीटीई से सीधा संबंध है और हम आपको हमारे उन अनुभवों के बारे में बताना चाहते हैं जिससे हम जूझ रहे हैं और आपके माओवादियों तक ये तकनीके जल्दी ही पहुँचने वाली हैं."

वे बताते हैं कि सुनामी के बाद सबसे पहले भारतीय सेना मदद के लिए पहुँची थी लेकिन वे आश्चर्य के साथ कहते हैं, "आपको शायद आश्चर्य हो कि एक भी भारतीय सैनिक ने हमसे एक भी सवाल नहीं पूछा है."

जिस दिन हम किलिनोच्ची में थे उसी दिन हमारे पूर्व सुरक्षा सलाहकार जे.एन. दीक्षित की मौत हुई. जे.एन. दीक्षित उस समय श्रीलंका में भारत के राजदूत हुआ करते थे भारतीय शांति सेना यहाँ एलटीटीई के खिलाफ लड़ रही थी.

 जे.एन दीक्षित सोचते थे कि भारत में श्रीलंका का राजदूत श्रीलंकाई राष्ट्रपति से ऊपर का पद होता है. मुझे आईपीकेएफ के ज़माने में जाफ़ना छोड़ कर भागना पड़ा क्योंकि भारतीय सेना हर तमिल को अपना दुश्मन मानती है
जाफ़ना के एक पत्रकार का मत

एक होटल के बार में जब मैंनै दीक्षित के बारे में राय पूछी तो जाफना के एक पत्रकार ने मुझसे कहा, "जेएन दीक्षित सोचते थे कि भारत में श्रीलंका का राजदूत श्रीलंकाई राष्ट्रपति से ऊपर का पद होता है. मुझे आईपीकेएफ के ज़माने में जाफ़ना छोड़ कर भागना पड़ा क्योंकि भारतीय सेना हर तमिल को अपना दुश्मन मानती है."

श्रीलंकाई सैनिकों ने मुझसे कहा, "भारतीय सैनिकों ने कई बार प्रभाकरण को जानबूझकर छोड़ दिया और उसके बाद देखिए उसने आपके देश पर कैसा कहर ढाया."

होटल के बार में आम लोगों के बीच भी कुछ ऐसी ही धारणा थी, "अमरीका ने ओसामा को बनाया और देखिए उसने उनके साथ क्या किया और भारत की प्रभाकरण के साथ कहानी कुछ वैसी ही है."

रैंक मौत के बाद

अगर आपको तमिल न आती हो तो एलटीटीई के तमिल अधिकृत इलाकों में किसी से भी बात कर उनकी वास्तविक भावना को समझ पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि एलटीटीई के इलाके में लोग पिछले 20 सालों से दुनिया से अलग-थलग रहे हैं और गृह युद्ध के दौरान उनकी शिक्षा नहीं के बराबर ही हो पाई है.

इसीलिए एलटीटीई के इलाके में आम लोग अंग्रेजी के वो शब्द भी नहीं समझ पाते जिसे हम आम बोलचाल का हिस्सा मानते हैं.

एलटीटीई के सैनिक
एलटीटीई को कभी भारत ने ही प्रशिक्षित किया था

एलटीटीई के नंबर दो और राजनीतिक प्रमुख तमिसेलवन भी अंग्रेजी में बात नहीं करते. उनसे सिर्फ उनके तमिल अनुवादकर्ता के माध्यम से ही बात की जा सकती है.

देर रात तमिलसेलवन से बातचीत के बाद जब मैं अंधेरे में होटल जाने के लिए खड़ा हुआ था किसी ने मुझे हिन्दी में आवाज़ लगाई, मैं चौंका. एलटीटीई का एक जवान शुद्ध हिन्दी में मुझसे बात करना चाह रहा था. मैंनै पूछा "तो आप उस एलटीटीई के दल के सदस्य थे जिसे भारतीय सेना ने देहरादून में प्रशिक्षित किया था?" चुप्पी से मुझे समझ आया कि वे इस प्रश्न की आशा नहीं कर रहे थे.

पर वे शुद्ध हिन्दी में मुझे बताते रहे कि 12 साल की उम्र में वे एलटीटीई में शामिल हुए थे पर पिछले 15 साल से उसके लिए लड़ रहे हैं. वे अपना नाम भी मुझे नहीं बताएंगे और कहा की एलटीटीई की सेना में उनका रैंक (पद) तब निर्धारित होगा जब उनकी मौत हो जाएगी. "जब मेरी मौत होगी तब ही यह तय होगा कि मैं मेजर था या कर्नल या ब्रिगेडियर."

उसने कहा कि भारत में बिताए चार वर्ष उसके लिए काफी सुखद थे और अब भी उसे वहाँ की याद सताती है. "मैंने फर्स्टएड के बारे में काफी कुछ वहाँ पर सीखा पर दुर्भाग्यवश मुझे आज हर भारतीय को शक की नज़र से देखना पड़ता है क्योंकि हमारे नेता आज भारत की हिट लिस्ट में हैं."

मैंने पूछा, तो आपके नेता प्रभाकरण कहाँ रहते हैं, उसने कहा "मुझे नहीं मालूम, मैं भी उन्हें साल में एक-दो बार ही देखता हूँ."

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